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Tuesday, June 27, 2023

नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में क्या समानता है?

जो समय के साथ नहीं चलते, समय उन्हें चलने लायक नहीं छोड़ता

2021 में ली गई सर्व सेवा संघ की यह फोटो शायद अब यादों में ही रहेगी.. अमन नम्र


आप कहेंगे कि ये कैसा सवाल हुआ भला? लेकिन सच मानिए यह कोई मजाक नहीं, बेहद गंभीर प्रश्न है। मैं एक बार फिर दोहराता हूं, नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में क्या समानता है? आइए देखते हैं। नोकिया को आप सभी जानते ही होंगे, जब दुनिया भर में नया-नया मोबाइल लॉन्च हुआ था तो नोकिया मोबाइल का पर्यायवाची सा बन गया था। मोबाइल खरीदने के लिए नोकिया कहना भर काफी था। पर आज मोबाइल के ग्लोबल मार्केट में यह कहां है। इसी तरह कोडक को देखिए, फोटोग्राफी के शौकीन हों या नौसिखिए, फोटो खींचने के लिए कोडक सर्वमान्य ब्रांड और नाम था। आज किसी नई पीढ़ी के साथी से कोडक के बारे में पूछेंगे तो शायद उसे गूगल सर्च करना पड़ जाए। तो क्या सर्व सेवा संघ के बारे में पूछने पर भी उसे गूगल सर्च करना पड़ेगा। मेरी 100 फीसदी गारंटी है कि हां। 



बस यही समानता है, नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में। जिस तरह इन दो बड़े ब्रांड वाली कंपनियों ने खुद को समय के साथ नहीं बदला, न उनके आगे बढ़ने की कोई दिशा थी ना ही प्रेरणा। उनका अपने यूजर्स के साथ संवाद भी नहीं बन पाया और ना ही वे अपनी साख बना या बचा पाए। क्या यही हाल सर्वोदय और सर्व सेवा संघ का नहीं हुआ है। आज की छोड़िए, 1977 में जनता पार्टी की गठबंधन सरकार के बनने के बाद से सर्व सेवा संघ का देश की राजनीति, अर्थनीति या सामाजिक अथवा बौद्धिक विकास में कितना सक्रिय योगदान रहा।

देश के बढ़ने और गढ़ने में सर्वाेदयी या गांधीवादी विचारकों, चिंतकों की हिस्सेदारी सेमिनार, सम्मेलन या लेख और भाषणों से आगे नहीं बढ़ पाई। जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में ही सर्व सेवा संघ ने अपने जीवन काल की सबसे सक्रिय भूमिका निभाई थी। और शायद उसी दौर में कमाई गई साख, सम्मान, लोकप्रियता के बल पर इस सर्वाेदयी संगठन से जुड़े लोग पूरी जिंदगी बिताना चाहते थे। पर ऐसा नहीं होता है।

गांधी के बाद जेपी और कुछ लोगों को लगा कि जेपी के बाद वीपी, यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह देश की राजनीति में गांधीवादी मूल्यों को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। वीपी सिंह ने शिक्षा नीति के बड़े बदलाव के लिए आचार्य राममूर्ति को शिक्षा समीक्षा समिति का अध्यक्ष बनाकर शायद इसकी कोशिश की भी थी, पर यह असफल रही। देश की बागडोर अंतत: कांग्रेस और भाजपा के ऐसे नेताओं के हाथ में ही बारी-बारी से आती-जाती रही जिनके लिए गांधीवादी मूल्य और सर्वाेदयी विचार कोई मायने नहीं रखते थे। 




कांग्रेस तो फिर भी अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि और गांधी, नेहरू, विनोबा की विरासत के चलते इन संस्थाओं में दखल देने से बचती रही। लेकिन सर्व सेवा संघ हो या साबरमती आश्रम या फिर सेवाग्राम, इन सभी ने मान लिया कि वे अजर, अमर हैं। वे देश की ऐसी धरोहर हैं कि कैडबरी चॉकलेट के विज्ञापन ‘कभी-कभी कुछ नहीं करना बेहतर होता है‘ को ही अपना मूल मंत्र मान बैठे। उनके कुछ न करने से देश की बागडोर उन हाथों में गई, जिनकी विचारधारा गांधी की हत्यारों से मेल खाती थी।

जाहिर है कि गांधी के विचारों से नफरत करने वाली सत्ता गांधी के अस्तित्व को बचाने के लिए भला कुछ भी क्यों करेगी। और कुछ भी न करके गांधीवादी, सर्वाेदयी नेताओं ने सत्ता का काम और भी आसान कर दिया। अगर खुदा न खास्ता, गांधीवादी या सर्वोदयी संस्थाएं, कार्यकर्ता या नेता सामाजिक या राजनीतिक तौर पर मुखर या सक्रिय होते और देश के तमाम जन मुद्दों पर खुलकर जनता के साथ खड़े होते तो शायद वर्तमान सत्ता को उनके खिलाफ कुछ करने के लिए दो बार सोचना पड़ता। लेकिन उनका कुछ न करना, सत्ता के लिए कुछ करने का मजबूत आधार बन गया। 

बहरहाल, पहले गांधी जी का अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम और अब बनारस का सर्व सेवा संघ सरकार की अलिखित, अघोषित गांधी विचार मिटाओ नीति की भेंट चढ़ गया है। इसे बचाने की कोशिश का ज्यादा कुछ फायदा होगा, ऐसा लगता नहीं है। ज्यादा से ज्यादा शायद कोर्ट से कुछ दिनों की राहत मिल जाए। पर आज नहीं तो कल, इन संस्थाओं को मिटना ही है।

अगर इस बारे में गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी के विचार सुनें तो चीजें और साफ नजर आएंगी। वे कहते हैं- गांधीवादी संस्थाओं की हालत आज वैसी ही हो गई है, जैसी कांग्रेस की हालत है। आंतरिक राजनीति ओर आंतरिक सत्ता संघर्षो में सारी संस्थाएं बंटी हुई हैं। मुझे दुख होता है यह कहने में कि ये सारी संस्थाएं निकम्मी हो गई हैं। कोई मतलब नहीं रह गया इनका। कई गांधीवादी संस्थाओं में संघियाें की घुसपैठ हो गई है और उनका ही कब्जा भी हो गया है। फिर भी, कुछ कथित गांधीवादी हैं जो संस्थाओं पर कब्जा करके बैठे हुए हैं, वे बिल्कुल बेध्यान होकर, केवल अपनी सत्ता, अपनी कुर्सी टिकाए रखने की होड़ में पड़े हुए हैं। अब ये तमाशा पब्लिक हो गया है, पहले ये अंदरूनी मामले होते थे। आजकल तो खुलेआम झगड़े हाेते हैं। सोशल मीडिया पर सर्व सेवा संघ और सेवाग्राम के बखेड़े हर दिन देखे जा सकते हैं। 




ऐसे में यही सच है वे लोग उन सवालों पर बिल्कुल सक्रिय नहीं हैं जो भारत और भारत के लोगों से जुड़े हैं। अगर सर्व सेवा संघ की ही बात करें तो भूदान आंदोलन के बाद भूदान में मिली जमीनों का उन्हें कस्टोडियन बनाया गया था। आज किसानों की समस्या इतनी गहरी और बड़ी है कि किसानों के अस्तित्व पर बात आ गई है। दो साल किसानों का आंदोलन चला, आज भी किसान असंतुष्ट है। उस आंदोलन में सर्व सेवा संघ के लोग कहीं भी नहीं दिखे। आप साबरमती आश्रम की ही बात करें। संघी सरकार के लिए कितना आसान हो गया है साबरमती आश्रम को कैप्चर करना। कुछ ही सालों में ये साबरमती आश्रम की तस्वीर ऐसी बदल देंगे कि उसमें बापू कहीं दिखाई भी नहीं देंगे। या जो गांधी उन्हें अनुकूल लगता है, उसे ही दिखाएंगे। 

आजादी से अब तक आश्रम के ट्रस्टियों ने अपने को सरकार के तंत्र और प्रभाव से सुरक्षित करके रखा था। कई बार आश्रम का जीर्णाद्धार हुआ, उसमें म्यूजियम बना। पूरा पैसा सरकार ने लगाया, लेकिन पूरी जवाबदेही ट्रस्ट के ही पास रही। पहली बार ऐसा हुआ कि सरकार ने कहा, आप सब हट जाओ, आपकी जरूरत नहीं है। हम अपने तरीक से फैसला करेंगे, काम करेंगे। सारे ट्रस्टी हाथ पर हाथ धरे बैठ गए। आखिर में अपनी सत्ता बचाने के लिए समर्थन भी कर दिया। 

ऐसी खोखली और पंगु संस्थाओं से यह आशा रखना कि वे देश के मामलों में आगे आएं और लड़ें, यह पूरी तरह निरर्थक है। अब न तो सर्वाेदय, न सर्व सेवा संघ, न ही किसी भी गांधीवादी संस्था का अस्तित्व ही इस लायक बचा है कि वह सामाजिक प्रश्नों, राजनीतिक प्रश्नों, देश के प्रश्नों पर काम कर सकेंगी। वहां झूठबाजी चल रही है, अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए झूठ का प्रयोग बेशर्मी से किया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि उनसे ऐसी कोई उम्मीद रखनी चाहिए कि जेपी के आंदोलन के समय जिस तरह सर्वोदय से जुड़े लोग आंदोलित हुए थे, वैसे अब हो पाएंगे। अब वैसे लोग ही नहीं रहे। 

जब खुद गांधी के प्रपौत्र यह बात कह रहे हों तो ज्यादा कुछ कहने तो बचता नहीं है। पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा है कि इस सर्व सेवा संघ की आत्मा तो बहुत पहले ही इसे छोड़कर जा चुकी थी। आत्मा के निकलने के बाद जिस तरह शरीर धीरे-धीरे गलता चला जाता है, लगभग वही हाल इस संस्थान का भी हो रहा है। तो, यह कहना ज्यादा मुफीद होगा कि 30 जून को इस मृतप्राय संस्थान काे दफना दिया जाएगा। एक मायने में यह ठीक ही है। मृत शरीर से संक्रमण ज्यादा फैलने की आशंका होती है।

लेकिन चिंता की बात तो यह है कि जहां कुछ गांधीवादी, सर्वाेदयी लोग अभी भी इसे बचाने की लगभग हार चुकी लड़ाई लड़ने की जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं कुछ गांधी और सर्वाेदययजीवी ऐसे भी हैं जो इस विध्वंस के बदले मुआवजे की मांग कर रहे हैं। यानी, गांधी और सर्वाेदयी विचारों पर बनी संस्था को खत्म करने के बदले सरकार कम से कम मुआवजा तो दे दे। गजब ही है। आश्चर्य होता है कि ऐसे लोग भी आखिर कब, क्यों और कैसे गांधी या सर्वाेदयी विचारों से जुड़े और अब तक कैसे इसका आडंबर ओढ़कर रह पाए। बहुत संभव है कि कल को ये सरकार से कहें कि अब हम आधिकारिक तौर पर गांधी विचारों को भी दफन करे हैं तो सरकार इसके बदले भी कुछ मुआवजा दे देा। और तय मानिए, सरकार खुशी-खुशी मुआवजा देने को राजी हो जाएगी।

यह अमृतकाल का स्वयोंदय है। जी हां, स्वयं का उदय। गांधी, विनोबा, जेपी जिस सर्वाेदय यानी सर्व के उदय की बात करते थे और जिनके हितों के संघर्ष करते-करते विदा हो गए, उनके बहुत से अनुयायी अब सर्वोदय से स्वयोंदय की ओर बढ़ चुके हैं। ऐसे में इन संस्थानों का बंद होना ही शायद गांधी और सर्वाेदयी विचारों को श्रद्धांजलि देने का सही मौका होगा। 


हां, निजी तौर पर यह दुख जरूर है कि मैंने अपने बचपन के सात साल उसी सर्व सेवा संघ के कैंपस में बिताएं हैं जिसे 30 जून को तोड़े जाने का नोटिस चस्पा कर दिया गया है। सामने गंगा और पीछे वरुणा को बहते देखने की याद आज भी जेहन में ताजा है। लेकिन गांधी और सर्वाेदयी विचारों की तरह यहां के भवन भी जर्जर हालत में आ चुके हैं। जब भवन पुराने, कमजोर और लाचार छोड़ दिए जाएं तो उनमें दीमक से लेकर चूहों या चमगादड़ों तक का घर बस जाता है। अब इन भवनों की जगह शायद किसी और विचार से लैस भव्य इमारतें कुछ दिनों में नजर आने लगें तो हैरानी नहीं होगी।

अब गांधीवादियों, सर्वोदयी लोगों को सरकार को यह सुझाव जरूर देना चाहिए कि इस नए निर्माण में वे कम से कम एक छोटा सा संग्रहालय जरूर बनाएं जिसमें लिखा हो निर्माण 1948,विध्वंस 2023। इस संग्रहालय में गांधी विचार से जुड़े इस शीर्ष संगठन के हिस्से रहे नेताओं के फोटो, उनकी किताबें, उनके लेख आदि भी होने चाहिएं। इनमें महात्मा गांधी, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, आचार्य कृपलानी, आचार्य विनोबा भावे, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जयप्रकाश नारायण, उनकी पत्नी प्रभावती, जेसी कुमारप्पा, आचार्य राममूर्ति,  अच्युत पटवर्धन, नारायण देसाई, विमला ठकार, निर्मला देशपांडे, कृष्णराज मेहता, शंकर राव देव जैसी हस्तियां जरूर शामिल की जाएं। विश्व विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर ई.एफ शुमाखर की किताब  `स्माल इज ब्यूटीफुल’ (Small is Beautiful ) भी इसका हिस्सा होनी चाहिए, जो उन्होंने यहीं लिखी थी।

Saturday, June 24, 2023

कभी पुतिन को Soup पिलाने वाले शेफ थे प्रिगोजिन, अब Coup कर मॉस्को घेरने चले

निजी सैन्य गुट किसी देश की संप्रभुता के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकते हैं




रूस की व्लादिमीर पुतिन सरकार के खिलाफ वहीं के भाड़े के सैनिक समूह वागनर ने बगावत कर दी है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वागनर समूह के प्रमुख येवगेनी प्रिगोजिन पर सशस्त्र विद्रोह का आरोप लगाया है और गिरफ्तारी का आदेश भी दे दिया है।

ये वही प्रिगोजिन हैं जो पहले एक रेस्तरां चलाते थे। कहा जाता है कि इस रेस्तरां में पुतिन भी खाने के लिए आते थे और यहीं से दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी।




खबर यह भी है कि वागनर के कई लड़ाके यूक्रेनी सैनिकों के साथ मिलकर रूस के रोस्तोव शहर में घुस गए हैं। इस वजह से रूस के महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। वहीं प्रिगोजिन का दावा है कि उनके सैनिकों ने यूक्रेन के साथ मिलकर कई जगहों पर रूस की सीमा में प्रवेश कर लिया है।

एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में प्रिगोजिन यह भी कह रहे हैं कि जब उनके सैनिकों ने सीमा पार की तो वहां मौजूद रूसी सैनिकों ने उन्हें गले लगाया। जबकि रूसी सैनिकों को उन्हें रोकने का आदेश दिया गया था। प्रिगोजिन ने कहा कि वे यूक्रेनी सीमा के पास रोस्तोव में प्रवेश कर रहे हैं।





प्रिगोजिन ने कहा, "हम आगे बढ़ रहे हैं और अंत तक जाएंगे। जो भी हमारे रास्ते में आएगा, उसे तबाह कर देंगे।" एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रिगोजिन ने रूस के नेतृत्व को उखाड़ फेंकने के लिए 25,000 सैनिकों को तैनात करने की कसम भी खाई है। उन्होंने कहा, "जो कोई भी विरोध करने की कोशिश करेगा, हम उन्हें खतरा मानेंगे और हमारे रास्ते में आने वाली सभी चौकियों सहित उन्हें तुरंत नष्ट कर देंगे।"

रूस में बढ़ाई सुरक्षा

वागनर की बगावत के बाद रूस में सुरक्षा बढ़ाई गई है। मॉस्को की सड़कों पर टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के वीडियो सामने आए हैं। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन की सुरक्षा के लिए भी टैंक तैनात किए गए हैं। खबर यह भी है कि आंतरिक मंत्रालय की इमारत के प्रवेश और निकास द्वार को बंद कर दिया गया है। राजधानी आने वाले हाईवे को बंद किया गया है। रूस की संसद ड्यूमा के आसपास भी सुरक्षा बढ़ाई गई है।




आखिर क्यों भड़का वागनर समूह?

प्रिगोजिन का आरोप है कि वागनर के प्रशिक्षण कैंप पर क्रेमलिन के आदेश पर मिसाइलों से हमले किए गए। प्रिगोजिन के मुताबिक इन हमलों में उसके कई सैनिक मारे गए हैं। उसका आरोप है कि रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई सोइगु, रूसी सैन्य जनरलों के साथ मिलकर वागनर ग्रुप को तबाह करना चाहते हैं।

कौन है येवगेनी प्रिगोजिन?



प्रिगोजिन वर्तमान में वागनर समूह के मुखिया हैं। यह एक तरह की निजी सेना है, जो रूस की सेना की मदद करती है। प्रिगोजिन इससे पहले एक रेस्तरां चलाते थे। कहा जाता है कि इस रेस्तरां में पुतिन भी खाने के लिए आते थे और यहीं से दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी।





प्रिगोजिन पर युद्ध अपराध और मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े कई आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले कई युद्धों में उनका वागनर समूह सक्रिय रहा है।


आइए अब जानते हैं कौन है वैगनर ग्रुप


वैगनर ग्रुप एक निजी सैन्य कंपनी (पीएमसी) है, जिसने हाल के वर्षों में काफी कुख्याति हासिल की है। रूसी भाड़े के सैनिकों से बना यह समूह दुनिया भर में विभिन्न संघर्षों में शामिल रहा है। हालांकि यह रूसी सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त नहीं है, फिर भी वैगनर समूह की गतिविधियों और क्रेमलिन के साथ कथित संबंधों से ऐसी अटकलें सामने आई हैं जिनसे इसकी शक्ति और प्रभाव के बारे में चिंताएं बढ़ी हैं। 




वैगनर समूह कब और कैसे बना:

वैगनर समूह की सटीक उत्पत्ति रहस्यमय है। समूह का नाम इसके संस्थापक, दिमित्री वेलेरिविच उत्किन, जो कि एक पूर्व रूसी विशेष बल अधिकारी थे, के नाम पर रखा गया है। उत्किन को उनके उपनाम "वैगनर" से भी जाना जाता है। रिपोर्टों से पता चलता है कि यह समूह 2014 के आसपास यूक्रेन में संघर्ष के दौरान उभरा, जहां यह एक निजी सुरक्षा फर्म की आड़ में काम करता था। ऐसा माना जाता है कि वैगनर समूह को रूसी सरकार से घनिष्ठ संबंध रखने वाले व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त था, जिससे अनौपचारिक राज्य समर्थन की अटकलें लगाई गईं।


कैसे हुआ वैगनर समूह का विकास और विस्तार


यूक्रेन में अपनी भागीदारी के बाद, वैगनर समूह ने सीरिया, लीबिया, सूडान और मध्य अफ्रीकी गणराज्य सहित अन्य संघर्ष क्षेत्रों में अपने संचालन का विस्तार किया। समूह ने अपनी लड़ाकू क्षमताओं के लिए कुख्याति प्राप्त की, जो अक्सर रूसी समर्थक गुटों के लिए लड़ाकू बलों के रूप में काम करता था। वैगनर समूह की गतिविधियों में प्रशिक्षण प्रदान करना, मिशन संचालित करना और युद्ध अभियानों में शामिल होना शामिल है। इसके लड़ाके हाल के वर्षों की कुछ सबसे भीषण लड़ाइयों में शामिल रहे हैं, जो दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं। 


क्रेमलिन से कथित संबंध


जबकि रूसी सरकार आधिकारिक तौर पर वैगनर समूह के साथ किसी भी संबंध से इनकार करती है, कई रिपोर्टों और जांचों ने इससे अलग ही बात कही है। रूसी भू--राजनीतिक हितों के साथ समूह के घनिष्ठ जुड़ाव और क्रेमलिन से जुड़े व्यक्तियों की उपस्थिति ने अनौपचारिक समर्थन की अटकलों को हवा दी है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि वैगनर समूह रूसी सरकार के लिए बिना उसकी आधिकारिक मंजूरी के काम कर सकता है, जो उसे प्रत्यक्ष भागीदारी या जवाबदेही के बिना अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की अनुमति देता है।

 

इस समूह से चुनौतियाँ और उसके निहितार्थ:


वैगनर समूह का उदय और प्रभाव घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई चुनौतियाँ और निहितार्थ प्रस्तुत करता है। घरेलू स्तर पर, समूह की गतिविधियाँ निजी सैन्य कंपनियों और रूसी राज्य के बीच संबंधों पर सवाल उठाती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, राज्य के हितों को आगे बढ़ाने और वैश्विक सुरक्षा पर संभावित प्रभाव के लिए भाड़े के सैनिकों के उपयोग के संबंध में चिंताएँ उठती हैं। वैगनर समूह की कार्रवाइयों ने उन देशों के साथ रूस के संबंधों को भी तनावपूर्ण बना दिया है जहां यह संचालित होता है, खासकर जब मानवाधिकारों के दुरुपयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना के आरोप सामने आए हैं।





वैगनर ग्रुप, दिमित्री उत्किन द्वारा स्थापित एक निजी सैन्य कंपनी, दुनिया भर के विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में एक प्रमुख खिलाड़ी बन गई है। रूसी सरकार से आधिकारिक मान्यता न होने के बावजूद, समूह की गतिविधियों और क्रेमलिन से कथित संबंधों ने महत्वपूर्ण ध्यान आकर्षित किया है। राष्ट्रपति पुतिन के खिलाफ तख्तापलट के प्रयास भले सफल न हो पाएं, फिर भी, वैगनर समूह का उदय और प्रभाव निजी सैन्य कंपनियों की भूमिका और घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर उनके प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।

दिमित्री उत्किन





Wednesday, June 21, 2023

‘अमूल गर्ल’ के जनक Sylvester da Cunha नहीं रहे, जानिए क्या है अमूल गर्ल का Shashi Tharur से रिश्ता

अमूल विज्ञापनों के हेड दा कुन्हा कहते हैं, कार्टून खतरे में है...




अमूल गर्ल को तो आप जानते ही होंगे। वही, अटर्लली बटरली डिलिशिएस। बिल्कुल सही पहचाना। पर क्या आप यह जानते हैं कि इसे बनाया किसने था। उनका नाम था सिल्वेस्टर दा कुन्हा। वे एक विज्ञापन एजेंसी के मालिक थे। 




अमूल गर्ल को रचने, उसे पहचान देने और देश के हर घर तक पहुंचाने वाले सिल्वेस्टर दा कुन्हा अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार देर रात उनका निधन हो गया। आइए जानते हैं सिल्वेस्टर दा कुन्हा और अमूल के रिश्ते की कहानी।

Sylvester da Cunha

 

कहानी अमूल की

बात शुरु होती है 1948 से। यानी वह साल, जब गुजरात के मशहूर बिज़नेसमैन त्रिभुवनदास पटेल ने अमूल की नींव रखी थी। अमूल यानी ‘आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड’ एक भारतीय कॉपरेटिव डेयरी है जो गुजरात के आणंद में मौजूद है। यह गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन लिमिटेड (GCMMF) की ओर से मैनेज किया जाने वालीा एक ब्रांड है। सन 1970 में ‘श्वेत क्रांति’ के ठीक 3 साल बाद वर्गीज कुरियन अमूल से जुड़े।. डॉ. कुरियन ने सन 1973 से 2006 तक GCMMF के संस्थापक-अध्यक्ष के तौर पर अमूल को फ़र्श से अर्श तक पहुंचा दिया।और आज, अमूल भारत का सबसे बड़ा खाद्य ब्रांड बन चुका है। यही नहीं, अमूल ने विदेशी बाज़ार में भी क़दम रखा है। अमूल के प्रोडक्ट 20 से अधिक देशों में बिक रहे हैं।

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आइए अब अमूल गर्ल के बारे में जानते हैं


यह बात सन 1966 की है। अमूल (Amul) ने ‘अमूल बटर’ के लिए एक ऐड कैंपेन डिज़ाइन करने का फ़ैसला किया। कंपनी ने एक विज्ञापन एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर सिल्वेस्टर दा कुन्हा (Sylvester da Cunha) से संपर्क किया। सिल्वेस्टर इस ऐड कैंपेन के लिए तैयार हो गए। पर समस्या ये थी कि विज्ञापन कैसा होगा और इसमें किसे कास्ट किया जाए, यानी किसे रोल दिया जाए। आख़िरकार यह तय हुआ कि विज्ञापन बच्चों से सम्बंधित होगा ताकि हिंदुस्तान के घर-घर में अमूल की जगह बनाई जा सके।


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अमूल का लोगो और इसके पापुलर टैगलाइन

अमूल के प्रोडक्ट्स ही नहीं इसक Logo भी भारत में काफ़ी मशहूर है। इसमें पोल्का डॉटेड फ़्रॉक पहने और नीले बालों की पोनी वाली एक लड़की नजर आती है। इसे हम सब ‘अमूल गर्ल’ के नाम से जानते हैं। उस समय ‘अमूल गर्ल’ को ‘अमूल’ के प्रतिद्वंद्वी ब्रांड ‘पोलसन’ की ‘बटर-गर्ल’ के काम्पिटीटर यानी प्रतिद्वंद्वी के रूप में बनाया गया था। और इसके पीछे ‘श्वेत क्रांति’ के जनक और ‘गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन लिमिटेड’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. वर्गीज कुरियन का दिमाग था। दरअसल, जब अमूल ऐड कैंपेन के हेड सिल्वेस्टर दा कुन्हा को अमूल के लिए Logo समझ नहीं आ रहा था तभी डॉ. कुरियन ने उन्हें Amul Girl का सुझाव दिया था। इसी दौरान अमूल की टैगलाइन ‘Amul The Taste of India’ भी फ़ाइनल की गई थी।

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712 बच्चियों में से चुनी गयी थी अमूल गर्ल ‘शोभा’





डॉ कुरियन के अमूल गर्ल के सुझाव और टैगलाइन के फाइनल होने से सिल्वेस्टर दा कुन्हा को ऐड कैंपेन का सब्जेक्ट मिल चुका था। इसके बाद वे विज्ञापन बनाने की तैयारी में जुटे। उन्होंने विज्ञापन के लिए देशभर से बच्चों की तस्वीरें मंगवाई। इस दौरान उन्हें 700 से अधिक तस्वीरें मिलीं। लेकिन इनमें से एक भी बच्चे की तस्वीर ऐड के लिए सेलेक्ट नहीं हो पाई। इससे हैरान, परेशान सिल्वेस्टर दा कुन्हा को अचानक याद आया कि केरल में उनके दोस्त चंद्रन थरूर की 2 ख़ूबसूरत बेटियां और 1 बेटा है। सिल्वेस्टर ने चंद्रन को फ़ोन कर कहा कि वो उनकी बड़ी बेटी शोभा को अमूल (Amul) के विज्ञापन में लेना चाहते हैं। चंद्रन पहले तो हैरान रह गए फिर उन्होंने इसके लिए हामी भर दी।

आखिर कौन है अमूल गर्ल




सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने चंद्रन थरूर से कहा कि वो जल्द से जल्द शोभा की कुछ तस्वीरें भेज दें। और इस तरह सिल्वेस्टर ने ऐड कैंपेन के लिए 712 बच्चों की तस्वीरों में से शोभा को चुना और शोभा अमूल के इस ऐड कैंपेन का चेहरा बन गईं। शोभा यानी शोभा थरूर। चंद्रन थरूर की सबसे बड़ी बेटी शोभा, दूसरी बेटी का नाम स्मिता, जबकि बेटे का नाम शशि थरूर है। जी हां, कांग्रेस सांसद और देश के लोकप्रिय नेता शशि थरूर (Shashi Tharoor)

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इस तरह शोभा बन गईं ‘अमूल गर्ल’

शोभा थरूर अपनी मां के साथ

सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने जल्द ही रोजमर्रा के मुद्दों से संबंधित विज्ञापनों के साथ होर्डिंग्स की एक सीरीज के रूप में ऐड कैंपेन तैयार किया। क्योंकि तब टीवी या डिजिटल का जमाना तो था नहीं। होर्डिंग ही विज्ञापन का मुख्य साधन थे। उस समय ये ऐड कैंपेन भारत में इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाले ऐड कैंपेन के तौर पर ‘गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में नाम दर्ज़ करवाया। इस तरह से शोभा ‘अमूल गर्ल’ का चेहरा बन गईं और ‘Utterly Butterly Delicious’ ऐड कैंपेन के ज़रिए करोड़ों भारतीयों के दिल जीते। यही नहीं, ‘थरूर फ़ैमिली’ भी केरल में मशहूर बन गई।


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शोभा ही नहीं, शशि और स्मिता थरूर भी अमूल के साथ जुड़े

स्मिता थरूर का पहला विज्ञापन



अमूल (Amul) का थरूर परिवार से जुड़ाव यहीं ख़त्म नहीं हुआ। कंपनी ने जब रंगीन विज्ञापनों की सीरीज़ जारी की तो इनके लिए अमूल ने चंद्रन थरूर की छोटी बेटी स्मिता को चुना। तब स्मिता ही पहली रंगीन अमूल बेबी थीं। देशभर में ‘अमूल गर्ल’ के तौर पर मशहूर होने के बाद सन 1977 में शोभा थरूर ‘मिस कोलकाता’ बनीं, जबकि स्मिता थरूर ‘मिस इंडिया’ की उपविजेता रहीं।

शशि थरूर भी विज्ञापन में नजर आए

केवल शोभा और स्मिता ही नहीं, शशि थरूर को भी अमूल के साथ स्पेस शेयर करने का मौका मिल चुका है. शशि थरूर ने जब भारतीय राजनीति में कदम रखा था. इसके कुछ साल बाद वो एक बार अमूल कार्टून पर नज़र आए थे. इस पर शशि थरूर ने चुटकी लेते हुए कहा था, ‘आज अगर मेरे पिता ज़िंदा होते तो अपने बेटे को मुंबई के मरीन ड्राइव में लगे ‘अमूल के होर्डिंग्स’ पर देखकर बेहद ख़ुश होते’।

यूस्टेस फर्नांडीस ने बनाया था अमूल गर्ल का स्केच




अमूल गर्ल का स्केच कला निर्देशक यूस्टेस फर्नांडीस द्वारा बनाया गया था। उनके पहले विज्ञापन में उत्पाद को "अटरली बटरली डिलेशियस" बताया गया था, जो सिल्वेस्टर की पत्नी, निशा दा कुन्हा बनाया था अमूल मोपेट के निर्माता और प्रतिष्ठित अमूल विज्ञापन बनाने वाले रेडियस एडवरटाइजिंग के बोर्ड के निदेशक यूस्टेस फर्नांडीस का 2010 निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे।

राहुल दा कुन्हा हैं अमूल विज्ञापन अभियान के प्रमुख, कहते हैं कार्टून अब राष्ट्रीय नहीं, लोकल मुद्दों पर

राहुल दा कुन्हा



1966 में शुरू हुए अमूल बटर अभियान की बागडोर सिल्वेस्टर के बेटे राहुल दा कुन्हा ने 19 साल पहले संभाली। अब दा कुन्हा कम्युनिकेशंस के एमडी और क्रिएटिव हेड हैं। वे कॉपी राइटर मनीष झावेरी और डिजाइनर-कार्टूनिस्ट जयंत राणे के साथ अपने कोलाबा कार्यालय से काम करते हैं। यह तिकड़ी, जिसे हम ब्रांड अमूल के संरक्षक से कम नहीं कहेंगे, लगभग दो दशकों से एक साथ हैं।




अमूल की कीमत लगभग 1,2000 करोड़ रुपये है जबकि बटर अभियान के लिए विज्ञापन खर्च 30-40 करोड़ रुपये है। और इन विज्ञापनों के मूल में सिर्फ यही तीन व्यक्ति हैं!

निश्चित रूप से दा कुन्हा जूनियर के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। वे कहते हैं “अभी हम जिस समय में रह रहे हैं वह विवादों, अपराधों और घोटालों से भरा है। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि इसके अलावा, कार्टून 'खतरे में' हैं और अब हम कार्टून का प्रचार करने वाले एकमात्र ब्रांड हो सकते हैं,''।




इससे पहले दा कुन्हा ने कॉन्ट्रैक्ट एडवरटाइजिंग और लिंटास के साथ काम किया। लगभग दो दशक बीत जाने के बाद, उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अमूल उनका अधिकांश समय लेता है। हालांकि वह कभी-कभार थिएटर में भी हाथ आजमाते हैं। “मेरे लिए अपना कान ज़मीन पर रखना बहुत ज़रूरी है। एक देश के रूप में हम बहुत बेचैन हो गये हैं। 




पहले, विषय और चर्चाएँ कम से कम एक पखवाड़े तक चलती थीं और हम हर शुक्रवार को एक विज्ञापन लेकर आ सकते थे। (अमूल गर्ल 'फ्राइडे टू फ्राइडे' स्टार के रूप में प्रसिद्ध थी।) अब, यह शुक्रवार की बात है, सोमवार की बात है, बुधवार की बात है और शायद उससे भी अधिक!"।




साथ ही, वह हमें अपने दर्शकों की प्राथमिकताओं में बदलाव के बारे में भी बताते हैं। “पहले, राष्ट्रीय मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण थे लेकिन अब, लोकल मुद्दे ज्यादा अहम हैं। मुंबई में एक आदमी को रेलवे बजट से ज्यादा शहर भर की खराब सड़कों की चिंता है। ऐसे में अब विज्ञापन अब राज्यवार सामने आते हैं,'' दा कुन्हा के मुताबिक अकेले मई में वे 18 विज्ञापन लेकर आए।


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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आठ साल... सेहत की चिंता का कोई और एजेंडा

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आठ साल... सेहत की चिंता का कोई और एजेंडा 




Tuesday, June 20, 2023

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आठ साल... सेहत की चिंता का कोई और एजेंडा

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आठ साल... सेहत की चिंता का कोई और एजेंडा 





आज पूरा देश, पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। राजस्थान के गर्म रेतीले धोरों से लेकर लद्दाख की ठंडी वादियों और गहरे समुद्र पर तैरते जहाजों से लेकर हवा में उड़ते विमानों तक लोग लोम-अनुलोम, कपाल भाति और सूर्य नमस्कार कर रहे हैं। 


पूरे आठ साल हो गए, देश-दुनिया को योग दिवस मनाते हुए। आखिर इससे क्या बदलाव आया। क्या योग लोगों के जीवन का हिस्सा बन पाया। क्या योग से लोगों की जीवन शैली से जुड़ी या पहले से माैजूद बीमारियों में कुछ कमी आई। क्या योग करने की वजह से लोग की मानसिक, शारीरिक सेहत पहले से बेहतर हुई है। और यह भी कि .. क्या देश की वर्तमान आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक उथलपुथल वाले माहौल में योग कुछ भूमिका निभा सकता है। 




ऐसे तमाम सवालों के जवाब के लिए आज हमने बात की है देश के जाने माने डॉ एके अरुण जी से। डॉ अरुण होम्यापैथी में एमडी हैं और रोगों के उपचार के साथ-साथ सामाजिक सरोकार से भी गहरा जुड़ाव रखते हैं। आज देखिए कि डॉ अरुण योग दिवस पर क्या कहते हैं।  


यह पूरा एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देखिए... यूट्यूब पर 

Sunday, June 18, 2023

आदिपुरुष… कहीं यह नैरेटिव बदलने के प्रयोग का हिस्सा तो नहीं

आदिपुरुष… कहीं यह छवि और नैरेटिव बदलने के प्रयोग का हिस्सा तो नहीं




16 जून को रिलीज हुई फिल्म आदिपुरुष पर इसके टीजर रिलीज होने के साथ ही विवाद शुरु हो गया था। 650 करोड़ की लागत से बनी अत्याधुनिक वीएफएक्स इफेक्ट से लैस इस फिल्म को इसके कंटेंट, इसके डायलाॅग्स और इसके कैरेक्टर्स की विवादित छवि दिखाने पर घेरा जा रहा है। जाहिर है, फिल्म के निर्माता, निर्देशक और खासकर डायलाॅग राइटर आलोचकों के सीधे निशाने पर हैं। एक्टर्स को छोड़ दें, क्योंकि वे तो वही करेंगे जो फिल्म का निर्देशक उनसे करवाएगा। बहरहाल, यहां इस फिल्म का जिक्र केवल इसलिए नहीं हो रहा है कि यह किन कारणों से विवाद में है, यह जिक्र इसलिए ज्यादा जरूरी है ताकि हम यह समझ सकें कि यह मामला केवल किसी एक फिल्म से जुड़ा है या फिर इसकी जड़ें काफी गहरी हैं, और यह किसी खास सोच के साथ किए जा रहे एक प्रयोग का हिस्सा भर है। हम ऐसी अटकलें तो लगा ही सकते हैं।

 

दरअसल बहस का बड़ा मुद्दा यह है कि इस फिल्म से हमारे दिलों में बसी भगवान श्री राम की सौम्य, मनोहर, शांतचित्त, धीर, गंभीर और पुरुषोत्तम वाली छवि को गहरा धक्का पहुंचा है। यही इस प्रयोग का सार भी है। क्योंकि यह सारा खेल ही छवि बदलने का है। तो क्या यह माना जाए कि यह अनायास नहीं सायास है। क्या हम यह कह सकते हैं कि यह संयोग नहीं है, यह प्रयोग है। क्या इसे नैरेटिव सेट करने का प्रयोग कहा जा सकता है। हम जानते हैं कि नैरेटिव सेट करना आसान काम नहीं हे। इसके लिए लंबा समय और काफी सारी मेहनत लगती है। ऐसा किसी एक फिल्म या एक बयान या एक मंदिर या एक मस्जिद या एक धरने या एक प्रदर्शन या एक विरोध से संभव नहीं होता। इसके लिए इन तमाम जरियों और तरीकों को बार-बार, लगातार दोहराने की जरूरत होती है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अगर किसी की नई छवि बनानी हो, या किसी मुद्दे पर नया नैरेटिव सेट करना हो, तो फिर भी काम थोड़ा आसान होता है। लेकिन जब चुनौती किसी सोच, किसी विचार, किसी सिद्धांत, किसी परंपरा या किसी व्यवहार को बदलने की हो, इनके आधार पर बनी छवि को बदलने की हो, इनके आधार पर पहले से बने नैरेटिव को बदलकर नया नैरेटिव सेट करने की हो, तो यह ज्यादा कठिन काम होता है। और यह फिल्म संभवत: इसी कठिन काम को अंजाम देने के बड़े प्रयोग या बड़ी मुहिम की महज एक कड़ी मानी जा सकती है।

नया, अलग और अपने खास मकसद के लिए नैरेटिव सेट करने के इस प्रयाेग में फिल्में भी एक अहम भूमिका अदा कर रही हैं। इसकी शुरुआत शायद द कश्मीर फाइल्स से हुई थी। इस फिल्म पर भी फैक्ट से छेड़छाड़ और समाज के खास वर्ग सहित सत्ताधारी राजनीतिक हित साधने के आरोप लगाए गए। इसे नैरेटिव सेट करने के एक छोटे प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है। तत्कालीन सत्ताधारी दल के खिलाफ, मुसलमानों के खिलाफ, कश्मीर के बहाने देश के दूसरे हिस्सों के लोगों को जैसा संदेश देने की कोशिश की गई, उसमें यह काफी हद तक सफल भी रही। इस बीच फिल्म से पैसों की कितनी कमाई हुई, उसे तो केवल सरप्लस या बोनस ही मानना चाहिए। क्योंकि असली लक्ष्य या असली उद्देश्य तो शायद कुछ और ही था। ऐसा बहुत से लोग मानते हैं।



इसी लाइन पर एक और फिल्म का नाम लिया जा सकता है। यह फिल्म है द केरला स्टोरी। यह भी संभवत: नैरेटिव सेट करने की दिशा में बढ़ने वाला एकदम साफ, स्पष्ट, सोचा-समझा गया कदम था। इस फिल्म में तो निर्माता, निर्देशक से लेकर राजनेता भी खुलकर सामने आ गए। हद तो यह रही कि सेंसर बोर्ड से एडल्ट सर्टिफिकेट मिलने वाली फिल्म को कई राज्यों ने टैक्स फ्री कर दिया। ए कैटेगरी के बावजूद इस फिल्म को भिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों ने स्कूली नाबालिग लड़कियों के साथ देखा। खुलेआम, पूरी बेशर्मी के साथ। केरला स्टोरी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो फिल्म मेकर्स ने निहायत ही बेशर्मी के साथ यह माना कि फिल्म गलत फैक्ट पर आधारित है। इसमें 32 हजार लड़कियों के धर्म परिवर्तन और आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल होने की बात काल्पनिक है, इसलिए फिल्म रिलीज होने के ऐन दिन इसे बदलकर 3 लड़कियों के धर्म परिवर्तन तक सीमित कर दिया गया।

 

इसके बाद भी फिल्म राजनीतिक समर्थन के साथ देश भर में देखी, दिखाई गई। हो सकता है कि इसका मकसद यह रहा हो कि नैरेटिव सेट करने में कोई दिक्कत न हो। हम यह भी कह सकते हैं कि फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट करने का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा। तो क्या हमें यह मानना चाहिए कि 72 हूरें और अजमेर 92 इसी कड़ी की आगामी फिल्में हैं जो खास कौम के प्रति नफरत की सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचने की राजनीतिक कामना पूरी करने में मदद करेंगी। ऐसा कहना अभी शायद जल्दबाजी होगी। हमें इन फिल्मों के आने और उसके लोगों पर पड़ने वाले असर का इंतजार करना चाहिए।



बहरहाल, हमने बात शुरू की थी छवि बदलने की। आदिपुरुष फिल्म में गुस्से वाले, नाराज दिख रहे, आक्रामक तेवर राम की छवि अनायास नहीं है। यह जानबूझकर ऐसी बनाई गई है। ताकि लोगों को यह पता चले कि सबके मन में बसे राम असल में वैसे नहीं हैं जैसा हम मानते आए हैं। वे केवल सहनशील और धैर्यवान नहीं हैं। अयोध्या के राजा हाेते हुए भी संन्यासी की तरह जीवन बिताने वाले राम का जीवन उनकी सहनशीलता को दिखाता है। यह भी कि वे केवल दयालु स्वभाव के नहीं थे। उन्होंने दया कर अपने निकट आए सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उन्होंने सभी को आगे बढ़ कर नेतृत्व करने का अधिकार दिया। सुग्रीव को राज्य दिलाना उनके दयालु स्वभाव का ही प्रतीक है।

यही नहीं, उन्होंने हर जाति, हर वर्ग यानी किसी तरह के भेदभाव से इतर मित्रता को निभाना भी सिखाया। केवट हो या सुग्रीव, निषादराज हों या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेले। इसके साथ ही श्री राम एक कुशल प्रबंधक और नेतृत्वकर्ता भी थे, जिस वजह से लंका जाने के लिए पत्थरों का सेतु बन पाया। भाई के प्रति प्रेम, त्याग और समर्पण की मिसाल भी राम से मिलती है। इसी वजह से भरत ने श्री राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता की सेवा की। इन्हीं वजहों से राम को पुरुषोत्तम माना गया।



लेकिन उनकी इन तमाम गुणों से लैस छवि शायद वर्तमान फिल्मकारों, शासकों, सत्ताधीशों को रास नहीं आई। क्योंकि ये गुण सत्ता में बने रहने के लिए अब व्यावहारिक नहीं लग रहे। इसलिए अब नए राम नए गुणों के साथ बनाए जाने लगे हैं। नए राम अपने दुश्मन को केवल मारते ही नहीं हैं, वे अपनी नाराजगी, अपना क्रोध, अपना बल सार्वजनिक रूप से प्रकट भी करते हैं।

                         

यह सत्ता के साथ मिलनी वाली जिम्मेदारी की मौजूदा या कम से कम ऐसी मान्यता वाली छवि से इतर सत्ता की ताकत, उसके घमंड, उसके अहंकार के सार्वजनिक प्रदर्शन की नई छवि बनाने की कवायद का हिस्सा है। कुछ ऐसा ही प्रयोग हुआ था जब पिछले साल नई संसद में देश के प्रतीक चिन्ह सारनाथ के सिंहों की स्थापना की गई थी। विपक्ष सहित देश के कई लोगों ने नई संसद में लगे सिंहों की आक्रामक मुद्रा पर आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि यह सारनाथ में रखे गए मूल प्रतीक से अलग है। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह प्रतीक चिन्ह कानूनन सही है। और जहां तक शेर के आक्रामक मुद्रा में होने की बात है, तो वह देखने वाले की सोच पर निर्भर करता है।


 

याचिकाकर्ताओं की यह भी दलील थी कि नई संसद के शेर ज्यादा उग्र दिख रहे हैं, उनके मुंह खुले हुए हैं, जिसमें नुकीले दांत दिख रहे हैं। इस पर जस्टिस एमआर शाह और कृष्ण मुरारी की बेंच ने कहा कि अगर शेर किसी को उग्र दिख रहा है तो यह उसकी अपनी सोच हो सकती है। इस याचिका के खारिज होने से इतर जो असली मुद्दा था वह इस पर हुई राजनीतिक बयानबाजी से सामने आया। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने कहा कि यह पुराने भारत का नहीं, नए भारत का शेर है। यह सौम्य नहीं हो सकता, यह आक्रामक ही होगा। जाहिर है कि शेरों का आक्रामक होना भी अनायास नहीं सायास था। यह भी सत्ता के बदलते चरित्र और उसकी छवि के नए नैरेटिव से जुड़ा प्रयोग था।

 

इन तमाम प्रयोगों से जनता को संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि केवल सत्ता ही नहीं बदली है, उसकी सोच, उसके तेवर, उसकी छवि, उसके काम करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। अगर हम सरकार या सत्ता के आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी जिम्मेदारियों या जनता की राेजमर्रा की समस्याओं के समाधान में सरकारी भूमिका की बात करें तो सरकार कितना ही अच्छा काम कर ले, जनता के बीच उसकी छवि वैसी नहीं बन पाती, जैसी वर्तमान सरकार या सत्ता चाहती है।

पारंपरिक सरकार या सत्ता की छवि के साथ जनता का जुड़ाव अक्सर अपनी पसंद, नापसंद या अपनी जरूरतों के पूरा होने पर निर्भर करता है। इसी वजह से सरकारें बदलती भी रहती हैं। हो सकता है कि इसी छवि को अब सरकार बदलना चाह रही हो। शायद वह जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अगर यह सरकार बदली तो जनता के सामने धर्म, राष्ट्र, अस्मिता, इज्जत, पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा। अगर उसे नई पहचान वाला, उग्र, आक्रामक, दुश्मनों के सिर पर सवार होने वाला, दुश्मनों का संहारक, अपनी शर्तों पर काम करने वाला शासक चाहिए जिससे कहीं न कहीं उसके अहं को भी पूरा करने का मौका मिलता हो तो उसे इसी सरकार को बनाए रखना होगा।

जाहिर है कि यह संदेश किसी एक रैली, एक बयान, एक घटना, एक विरोध प्रदर्शन या एक फिल्म से नहीं दिया जा सकता। यह नैरेटिव बदलने का काम है। इसके लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत होती है। स्कूली कोर्स से गांधी को हटाने या डार्विन को बाहर करने से लेकर मुगल सराय, मुगल गार्डन या फैजाबाद का नाम बदलने, आदिपुरुष में हनुमान को बजरंग कहलाने, नई संसद बनाने और उसमें खूंखार शेरों का प्रतीक चिन्ह स्थापित करने और इतिहास के पुनर्लेखन से लेकर बुलेट ट्रेन वाले भारत के भविष्य की अलग छवि बनाने तक की कवायद इसमें शामिल है। 

इससे समाज को कितना फायदा या नुकसान होगा, इसके लिए हमें कहीं बाहर जाने या किसी रिसर्च रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। आप अपने घर के अन्य सदस्यों से बात कर सकते हैं या अपनी सोसायटी के वॉट्सएप ग्रुप में चल रही बहस पर नजर डाल सकते हैं, अंतर नजर आ जाएगा। यह देश हमारा और आपका है, इसके अच्छे- बुरे का फैसला भी हमको और आपको ही करना है।



Friday, June 16, 2023

Adipurush… कहानी, सीन, डायलॉग, चरित्र सब पर विवाद… फिर कोर्ट पहुंची फिल्म, अरुण गोविल बोले- आस्था से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं...

टीजर से शुरु हुआ विवाद फिल्म के रिलीज तक जारी, क्या होगा Adipurush का भविष्य





बहुचर्चित फिल्म Adipurush 16 जून को रिलीज हो गई। पहले यह 12 जनवरी को रिलीज होनी थी। लेकिन अक्टूबर में जारी टीजर के साथ फिल्म से जुड़े विवादों का सिलसिला शुरू हो गया था। इस वजह से फिल्म की रिलीज डेट 12 जनवरी से मई तक के लिए आगे बढ़ा दी गई थी। आखिरकार यह 16 जून को देश भर में रिलीज की गई।



अंतत: फिल्म तमाम विवादों के साथ रिलीज हुई। थियेटरों में एक सीट हनुमान जी के लिए आरक्षित रखने, सीट पर सीता, राम, हनुमान की फोटो रखने, उसकी पूजा करने के टोटकों के साथ करीब 650 करोड़ की लागत वाली फिल्म की भव्य शुरुआत भी हो गई।


दावे किए गए कि यह इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म बनेगी। इसके एडवांस टिकट बुकिंग के आंकड़ों ने भी पठान को पीछे छोड़ दिया… पहले दिन की कमाई भी करीब 140 करोड़ हो गई है। इसलिए तमाम विवादों के बीच मनोज मुंतशिर ने इस कमाई के लिए देश का आभार जताया है।


इसके बाद शुरू हुआ दर्शकों की प्रतिक्रिया का दौर। फिल्म का पहला शो खत्म होने के बाद बाहर निकले दर्शकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही। कुछ संतुष्ट नजर आए, वहीं बड़ी संख्या ऐसे दर्शकों की रही जो फिल्म देखने बड़ी उम्मीद से गए थे, पर बाहर निकलते समय उनका गुस्सा, उनकी झल्लाहट यह बता रही थी, कि फिल्म में सबकुछ वैसा नहीं है, जैसा बताया जा रहा था।


और कुछ ही देर में सोशल मीडिया में बॉयकाटआदिपुरुष से लेकर फिल्म के निर्माता, निर्देशक, कवि सभी निशाने पर आ गए। और शाम होते-होते फिल्म के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका भी दाखिल हो गई। यही नहीं रामायण सीरियल के लक्षमण के बाद श्री राम यानी अरुण गोविल भी इस फिल्म से नाराज दिखे। एक वीडियो जारी कर उन्होंने साफ-साफ कहा कि हमारी आस्था से छेड़छाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है। नीचे देखिए पूरा वीडियो...


आइए.. इस ऐतिहासिक कही, मानी जा रही फिल्म के इतिहास, वर्तमान और भविष्य पर एक नजर डालते हैं। 

पहले फिल्म की बुनियादी जानकारी

आदिपुरुष एक बॉलीवुड फिल्म है, जो कथित तौर पर रामायण महाकाव्य से प्रेरित बताई जा रही है। यह फिल्म ओम राउत द्वारा निर्देशित और टी-सीरीज़ फिल्म्स और रेट्रोफाइल्स द्वारा निर्मित है। हिंदी और तेलुगु भाषाओं में इस फिल्म को एक साथ फिल्माया गया है। फिल्म में प्रभास राघव यानी राम, कृति सेनन जानकी यानी सीता और सैफ अली खान लंकेश यानी रावण के रूप में हैं। फिल्म के डायलॉग मुंतशिर मनोज शुक्ला ने लिखे हैं। 


आदिपुरुष फिल्‍म के रिलीज होने के साथ ही विरोध भी शुरू हो गया है। आदिपुरुष देखकर लौटे दर्शकों ने इसके कुछ डायलॉग सोशल मीडिया पर डाले, इसके बाद विरोध और बढ़ गया। आइए ऐसे कुछ डायलॉग देखते हैं…

"कपड़ा तेरे बाप का! तेल तेरे बाप का! जलेगी भी तेरे बाप की"
"तेरी बुआ का बगीचा है क्या जो हवा खाने चला आया"
"जो हमारी बहनों को हाथ लगाएंगे उनकी लंका लगा देंगे"
"आप अपने काल के लिए कालीन बिछा रहे हैं"
"मेरे एक सपोले ने तुम्हारे शेषनाग को लंबा कर दिया अभी तो पूरा पिटारा भरा पड़ा है"।

जाहिर है कि आदिपुरुष के अबतक सामने आए रिव्‍यू में लोगों का कहना है कि फिल्‍म में कई जगह ऐसी भाषा का प्रयोग हुआ है जो भगवान श्रीराम और रामायण के वक्‍त पर त्रेता युग में इस्‍तेमाल होने वाली भाषा से मेल नहीं खाती है। एक जगह फिल्‍म में डायलॉग का इस्‍तेमाल किया गया है, ‘तेरी जली ना?’ इसी तरह एक अन्‍य जगह लाइन का इस्‍तेमाल हुआ है ‘तेल तेरे बाप का आग तेरे बाप की…’. यही वजह है कि करीब 500 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्‍म के शुरुआती रिव्‍यू अच्‍छे नहीं रहे हैं।
इस फिल्म के डायलॉग्स के लिए मशहूर कवि, लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला की काफी आलोचना हो रही है। वहीं उनका यह कहना है कि इस भाषा में रामायण बड़े बड़े संत सुनाते हैं और दादी-नानी भी अपने बच्चों को इसी भाषा में रामायण सुनाया करती थीं।
आइए देखते हैं.. कुछ जाने-माने फिल्म आलोचक इस बारे में क्या राय रखते हैं। 

अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, यह आदिपुरुष बाल्मीकि रामायण को कतई नहीं

निश्चित ही अशोक वाटिका बजरंग की बुआ का बगीचा नहीं था। और यह #आदिपुरुष बाल्मीकि रामायण तो कतई ही नहीं है। यह ओम राऊत और मनोज मुंतशिर की रामायण है, जिसमें राघव, शेष, जानकी और बजरंग यंत्रचालित किरदार हैं। https://youtu.be/wMyxpyfXdsk बाकी आप मेरी राय सुन लीजिए।

तरन आदर्श ने ऐतिहासिक दुर्भाग्य बताया

कुछ ऐसा ही रिव्यू taran adarsh का भी है। वे इसे आधा स्टार देते हुए कहते हैं कि यह ऐतिहासिक दुर्भाग्य है।   
#OneWordReview... #Adipurush: DISAPPOINTING. Rating: ½ #Adipurush is an EPIC DISAPPOINTMENT… Just doesn’t meet the mammoth expectations… Director #OmRaut had a dream cast and a massive budget on hand, but creates a HUGE MESS. #AdipurushReview

पढ़िए, कीर्ति आजाद की राय

इसी तरह राजनेता और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद कहते हैं कि राजीव गाँधी जी के समय बनाये गये रामायण और मोदी के समय बनवाये गये रामायण #आदिपुरूष के पात्र और डायलॉग को सुने तो समझ आता है सभ्यता और संस्कृति, मान और अपमान किसे कहते हैं। आदिपुरुष ने ऐसे बताया है की वाल्मीकि जी ने रामायण में काफ़ी ग़लतियाँ की थी, उन ग़लतियों को सुधारा गया है… विस्तार से पढ़िए..

कीर्त आजाद ने फिल्म के कुछ डायलॉग भी शेयर किए..



इसी तरह फिल्म को लेकर मीम का सिलसिला भी शुरू हो गया हैं। देखते हैं, इससे जुड़े कुछ मीम्स। 



इस तरह भी दर्शकों ने फिल्म के रिव्यू किए...देखिए यह वीडियो


इन तमाम वजहों से शाम होते-होते फिल्म का विवाद इसे दिल्ली हाई कोर्ट तक ले गया। विरोध करने वाले मुसलिम या अर्बन नक्सल नहीं बल्कि हिन्‍दू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता हैं। उनका कहना है कि फिल्‍म में भगवान श्रीराम का मजाक उड़ाया गया है। लिहाजा दिल्‍ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाकर फिल्‍म को बैन करने की मांग की गई है। हिन्‍दू सेना के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष विष्‍णु गुप्‍ता चाहते हैं कि हाई कोर्ट सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन (CBFC) को यह आदेश दें कि इस फिल्‍म को सर्टिफिकेट ना दिया जाए।


जनहित याचिका में कहा गया कि महार्षि वाल्मीकि और संत तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामायण में भगवान श्रीराम को जिस तरह से दिखाया गया है, यह फिल्‍म उससे मेल नहीं खाती। लिहाजा इस फिल्‍म से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। याचिका में कहा गया कि पेश मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से भी संपर्क किया गया था लेकिन उन्‍होंने इसपर दिलचस्‍पी नहीं दिखाई। जिसके बाद उनके पास अदालत में जनहित याचिका लगाने के अलावा अन्‍य कोई रास्‍ता नहीं बचा था।

याचिका में यह भी कहा गया कि फिल्‍म में रावण की भूमिका निभा रहे सैफ अली खान और हनुमान का चरित्र भी भारतीय सभ्‍यता से मेल खाता नहीं दिखता है। रावण एक ब्राह्मण थे। लेकिन जिस तरह से दाढ़ी वाला भयंकर लुक रावण को दिया गया है वो भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला है। रामायण की असल कहानी से ये जरा भी मेल नहीं खाता है। 


याचिका के मुताबिक “फिल्म #आदिपुरुष द्वारा हिंदू धार्मिक शख्सियतों का विकृत सार्वजनिक प्रदर्शन अंतःकरण और अभ्यास की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है, साथ ही अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता का भी उल्लंघन है।
दलील में यह भी कहा गया है कि फिल्म निर्माताओं को केंद्र सरकार और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा किसी भी फीचर फिल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है " क्योंकि यह सार्वजनिक व्यवस्था और समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बिगाड़ सकती है।"

विवादों से आदिपुरुष का रिश्ता

राम कथा पर आधारित इस फ़िल्म को रावण से लेकर सीता समेत दूसरे किरदारों के फिल्मांकन पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस फिल्म पर विवाद भारत में ही नहीं, पड़ोसी देशों तक पहुंच गया है। इसमें सीता के किरदार से जुड़े एक डायलॉग पर नेपाल में विवाद हो गया है। इस फ़िल्म में सीता को ‘भारत की बेटी’ बताया गया है। नेपाल की राजधानी काठमांडु के मेयर ने इसी डायलॉग पर आपत्ति जताई। बालेंद्र शाह 'बालेन' ने फिल्म निर्माताओं से कहा कि वे अपनी फ़िल्म में से इस डायलॉग को हटा दें। क्याकि नेपाल दावा करता आया है कि पौराणिक किरदार सीता का जन्म नेपाल के जनकपुर में हुआ था इसी वजह से नेपाल में फिल्म के इस डायलॉग पर विवाद खड़ा हुआ है।


काठमांडु मेयर बालेंद्र शाह ‘बलेन’ ने कहा कि ‘जब तक आदिपुरुष में से सीता को भारत की बेटी बताने वाला संवाद हटाया नहीं जाएगा तब तक किसी भी हिंदी फ़िल्म को काठमांडु मेट्रोपॉलिटन सिटी में नहीं चलने दिया जाएगा। इस चेतावनी के बाद फिल्म मेकर्स ने इस हिस्से को काटा। इसके बाद ही नेपाल सेंसर बोर्ड की ओर से फिल्म को वहां रिलीज की अनुमति दी गई।

टीजर के रिलीज हाेते ही विवादों की शुरुआत



2 अक्टूबर को अयोध्या में आदिपुरुष का टीजर रिलीज किया गया था। उसके बाद ही फिल्म में राम (प्रभास) और रावण (सैफ अली खान) के किरदारों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। तब उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने आदिपुरुष के टीजर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सनातन धर्म में किसी को बदलाव की अनुमति नहीं है। उन्होंने सैफ अली खान के रावण लुक पर भी अपनी नाराजगी व्यक्त की।


दरअसल आदिपुरुष में सैफ के रावण वाले लुक को लेकर सबसे ज्यादा बखेड़ा खड़ा हुआ। मशहूर एक्ट्रेस और राजनेता मालविका अविनाश के अनुसार आदिपुरुष में रावण का किरदार इतिहास के आधार पर नहीं है। जिसे देख कर मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म निर्माताओं ने अधिक शोध नहीं किया है।


इसके अलावा मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने आदिपुरुष के टीजर में हनुमान जी के पहनावे में चमड़े का वस्त्र देखकर नाराजगी जताई थी। उनके मुताबिक फिल्म के टीजर में राम, रावण और हनुमान का लुक और पहनावा बेहद गलत है।

विवाद से आगे बढ़ी आदिपुरुष की रिलीज डेट

आदिपुरुष' को लेकर शुरू विवाद के चलते फिल्म की रिलीज डेट को आगे खिसका दिया गया। प्रभास, कृति सेनन, सैफ अली खान और सनी कौशल की 'आदिपुरुष' 12 जनवरी 2023 के लिए शेड्यूल थी। 12 जनवरी को रिलीज के पोस्टर जारी के बावजूद इसकी रिलीज मई तक के लिए टाल दी गई थी। आखिरकार यह 16 जून को रिलीज हुई। इसी तरह टीजर के रिलीज होते ही 'आदिपुरुष' के वीएफएक्स (Adipurush VFX) पर विवाद हुआ था। इस वजह से इसे नए सिरे से क्रिएट करने की तैयारी की गई थी।


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म के वीएफएक्स के लिए मेकर्स ने 100 करोड़ का एडिशनल बजट अलॉट करना तय किया। ताकि इसके रिक्रिएशन पर काम किया जा सके और तमाम विवादों से बचा जा सके। इसका मतलब ये कि 'आदिपुरुष' का कुल बजट 600 करोड़ के पार है। पहले ही मेकर्स इसे बनाने में 500 करोड़ (Adipurush Budget) की भारी भरकम रकम खर्च कर चुके थे।


रावण के किरदार में सैफ अली खान और श्रीराम के रोल में प्रभास के सीन्स को री-शूट नहीं बल्कि सीन्स को रिक्रिएट किया जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे रोबोट 2.0 के समय भी डायरेक्टर शंकर ने किया था।

पोस्टर पर विवाद, थाने में शिकायत भी हुई

आदिपुरूष का हाल ही में रिलीज नए पोस्टर में प्रभास को राम, कृति सेनन को सीता, सनी सिंह को लक्ष्मण और देवदत्त को हनुमान के कैरेक्टर में देखा गया। लेकिन इस पर विवाद हो गया। मुंबई के साकीनाका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई है कि पोस्टर ने हिंदू धर्म की धार्मिक भावनाओं को पहुंचाया है। फिल्म के डायेरेक्टर ओम राउत, प्रोड्यूसर भूषण कुमार और एक्टर्स के नाम पर संजय दीनानाथ तिवारी ने यह शिकायत दर्ज कराई। वे खुद को सनातन धर्म का प्रचारक बताते हैं।

जनेऊ न पहनने की भी शिकायत की गई 



आदिपुरुष के नए पोस्टर के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट के एडवोकेट आशीष राय और पंकज मिश्रा के माध्यम से भी एक शिकायत दर्ज करवाई गई। शिकायत में बताया गया है, कि फिल्म निर्माता ने हिंदी धर्म ग्रंथ "रामचरितमानस" के पात्र को अनुचित तरह से दर्शाया है। बॉलीवुड फिल्म "आदिपुरुष" के नए रिलीज पोस्टर में हिंदू धर्म समाज के धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया है। यह शिकायत भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए), 298, 500, 34 के तहत FIR दर्ज करने की मांग के साथ दर्ज करवाई गई है।
शिकायत में बताया गया है कि 'आदिपुरुष' फिल्म हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ "रामचरितमानस" मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवनी पर बनाई गई है।  इस पवित्र ग्रंथ "रामचरितमानस" का सनातनी धर्म कई युगों से अनुसरण करते आ रहे हैं। हिंदू धर्म में "रामचरितमानस" में उल्लेख मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी एवं सभी पूजनीय पात्रों का विशेष महत्व है। शिकायतकर्ता ने बताया कि बॉलीवुड फिल्म आदिपुरुष के रिलीज पोस्टर में रामायण के सभी एक्टर्स को बगैर जनेऊ धारण किए ही दिखाया गया है।. जो कि गलत है।.

लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ने की चेतावनी



रिलीज किए गए पोस्टर में कृति सेनन को अविवाहित महिला के तौर पर बगैर सिंदूर के साथ दिखाया गया।. इससे यह साफ है कि उन्हें अविवाहित महिला के तौर से दिखाया जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि बॉलीवुड फिल्म निर्माता निर्देशक एवं कलाकारों ने ऐसा जानबूझकर किया है। ऐसा कर के वो सनातन धर्म का अपमान कर रहे हैं। ये बेहद निंदनीय है।
आदिपुरुष के पोस्टर ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। इसकी वजह से भविष्य में निश्चित तौर से भारत के विभिन्न राज्यों में लॉ एंड ऑर्डर को खतरा हो सकता है। और अब जब यह फिल्म रिलीज हो चुकी है, तमाम आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। यानी गलत मंशा से भूतकाल काे वर्तमान में दर्शाने की इस फिल्म के निर्माता, निर्देशकों ने इच्छा ने फिल्म का और उनका भविष्य संकट में डाल दिया है। अब तक के इस फिल्म के हाल को देखकर को बस दो ही शब्द मुंह से निकलते हैं... हे राम!







सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

पहले मशहूर शायर शहरयार की यह ग़ज़ल पढ़िए... सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है दिल है तो धड़कने...