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Tuesday, June 27, 2023

नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में क्या समानता है?

जो समय के साथ नहीं चलते, समय उन्हें चलने लायक नहीं छोड़ता

2021 में ली गई सर्व सेवा संघ की यह फोटो शायद अब यादों में ही रहेगी.. अमन नम्र


आप कहेंगे कि ये कैसा सवाल हुआ भला? लेकिन सच मानिए यह कोई मजाक नहीं, बेहद गंभीर प्रश्न है। मैं एक बार फिर दोहराता हूं, नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में क्या समानता है? आइए देखते हैं। नोकिया को आप सभी जानते ही होंगे, जब दुनिया भर में नया-नया मोबाइल लॉन्च हुआ था तो नोकिया मोबाइल का पर्यायवाची सा बन गया था। मोबाइल खरीदने के लिए नोकिया कहना भर काफी था। पर आज मोबाइल के ग्लोबल मार्केट में यह कहां है। इसी तरह कोडक को देखिए, फोटोग्राफी के शौकीन हों या नौसिखिए, फोटो खींचने के लिए कोडक सर्वमान्य ब्रांड और नाम था। आज किसी नई पीढ़ी के साथी से कोडक के बारे में पूछेंगे तो शायद उसे गूगल सर्च करना पड़ जाए। तो क्या सर्व सेवा संघ के बारे में पूछने पर भी उसे गूगल सर्च करना पड़ेगा। मेरी 100 फीसदी गारंटी है कि हां। 



बस यही समानता है, नोकिया, कोडक और सर्व सेवा संघ में। जिस तरह इन दो बड़े ब्रांड वाली कंपनियों ने खुद को समय के साथ नहीं बदला, न उनके आगे बढ़ने की कोई दिशा थी ना ही प्रेरणा। उनका अपने यूजर्स के साथ संवाद भी नहीं बन पाया और ना ही वे अपनी साख बना या बचा पाए। क्या यही हाल सर्वोदय और सर्व सेवा संघ का नहीं हुआ है। आज की छोड़िए, 1977 में जनता पार्टी की गठबंधन सरकार के बनने के बाद से सर्व सेवा संघ का देश की राजनीति, अर्थनीति या सामाजिक अथवा बौद्धिक विकास में कितना सक्रिय योगदान रहा।

देश के बढ़ने और गढ़ने में सर्वाेदयी या गांधीवादी विचारकों, चिंतकों की हिस्सेदारी सेमिनार, सम्मेलन या लेख और भाषणों से आगे नहीं बढ़ पाई। जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में ही सर्व सेवा संघ ने अपने जीवन काल की सबसे सक्रिय भूमिका निभाई थी। और शायद उसी दौर में कमाई गई साख, सम्मान, लोकप्रियता के बल पर इस सर्वाेदयी संगठन से जुड़े लोग पूरी जिंदगी बिताना चाहते थे। पर ऐसा नहीं होता है।

गांधी के बाद जेपी और कुछ लोगों को लगा कि जेपी के बाद वीपी, यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह देश की राजनीति में गांधीवादी मूल्यों को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। वीपी सिंह ने शिक्षा नीति के बड़े बदलाव के लिए आचार्य राममूर्ति को शिक्षा समीक्षा समिति का अध्यक्ष बनाकर शायद इसकी कोशिश की भी थी, पर यह असफल रही। देश की बागडोर अंतत: कांग्रेस और भाजपा के ऐसे नेताओं के हाथ में ही बारी-बारी से आती-जाती रही जिनके लिए गांधीवादी मूल्य और सर्वाेदयी विचार कोई मायने नहीं रखते थे। 




कांग्रेस तो फिर भी अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि और गांधी, नेहरू, विनोबा की विरासत के चलते इन संस्थाओं में दखल देने से बचती रही। लेकिन सर्व सेवा संघ हो या साबरमती आश्रम या फिर सेवाग्राम, इन सभी ने मान लिया कि वे अजर, अमर हैं। वे देश की ऐसी धरोहर हैं कि कैडबरी चॉकलेट के विज्ञापन ‘कभी-कभी कुछ नहीं करना बेहतर होता है‘ को ही अपना मूल मंत्र मान बैठे। उनके कुछ न करने से देश की बागडोर उन हाथों में गई, जिनकी विचारधारा गांधी की हत्यारों से मेल खाती थी।

जाहिर है कि गांधी के विचारों से नफरत करने वाली सत्ता गांधी के अस्तित्व को बचाने के लिए भला कुछ भी क्यों करेगी। और कुछ भी न करके गांधीवादी, सर्वाेदयी नेताओं ने सत्ता का काम और भी आसान कर दिया। अगर खुदा न खास्ता, गांधीवादी या सर्वोदयी संस्थाएं, कार्यकर्ता या नेता सामाजिक या राजनीतिक तौर पर मुखर या सक्रिय होते और देश के तमाम जन मुद्दों पर खुलकर जनता के साथ खड़े होते तो शायद वर्तमान सत्ता को उनके खिलाफ कुछ करने के लिए दो बार सोचना पड़ता। लेकिन उनका कुछ न करना, सत्ता के लिए कुछ करने का मजबूत आधार बन गया। 

बहरहाल, पहले गांधी जी का अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम और अब बनारस का सर्व सेवा संघ सरकार की अलिखित, अघोषित गांधी विचार मिटाओ नीति की भेंट चढ़ गया है। इसे बचाने की कोशिश का ज्यादा कुछ फायदा होगा, ऐसा लगता नहीं है। ज्यादा से ज्यादा शायद कोर्ट से कुछ दिनों की राहत मिल जाए। पर आज नहीं तो कल, इन संस्थाओं को मिटना ही है।

अगर इस बारे में गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी के विचार सुनें तो चीजें और साफ नजर आएंगी। वे कहते हैं- गांधीवादी संस्थाओं की हालत आज वैसी ही हो गई है, जैसी कांग्रेस की हालत है। आंतरिक राजनीति ओर आंतरिक सत्ता संघर्षो में सारी संस्थाएं बंटी हुई हैं। मुझे दुख होता है यह कहने में कि ये सारी संस्थाएं निकम्मी हो गई हैं। कोई मतलब नहीं रह गया इनका। कई गांधीवादी संस्थाओं में संघियाें की घुसपैठ हो गई है और उनका ही कब्जा भी हो गया है। फिर भी, कुछ कथित गांधीवादी हैं जो संस्थाओं पर कब्जा करके बैठे हुए हैं, वे बिल्कुल बेध्यान होकर, केवल अपनी सत्ता, अपनी कुर्सी टिकाए रखने की होड़ में पड़े हुए हैं। अब ये तमाशा पब्लिक हो गया है, पहले ये अंदरूनी मामले होते थे। आजकल तो खुलेआम झगड़े हाेते हैं। सोशल मीडिया पर सर्व सेवा संघ और सेवाग्राम के बखेड़े हर दिन देखे जा सकते हैं। 




ऐसे में यही सच है वे लोग उन सवालों पर बिल्कुल सक्रिय नहीं हैं जो भारत और भारत के लोगों से जुड़े हैं। अगर सर्व सेवा संघ की ही बात करें तो भूदान आंदोलन के बाद भूदान में मिली जमीनों का उन्हें कस्टोडियन बनाया गया था। आज किसानों की समस्या इतनी गहरी और बड़ी है कि किसानों के अस्तित्व पर बात आ गई है। दो साल किसानों का आंदोलन चला, आज भी किसान असंतुष्ट है। उस आंदोलन में सर्व सेवा संघ के लोग कहीं भी नहीं दिखे। आप साबरमती आश्रम की ही बात करें। संघी सरकार के लिए कितना आसान हो गया है साबरमती आश्रम को कैप्चर करना। कुछ ही सालों में ये साबरमती आश्रम की तस्वीर ऐसी बदल देंगे कि उसमें बापू कहीं दिखाई भी नहीं देंगे। या जो गांधी उन्हें अनुकूल लगता है, उसे ही दिखाएंगे। 

आजादी से अब तक आश्रम के ट्रस्टियों ने अपने को सरकार के तंत्र और प्रभाव से सुरक्षित करके रखा था। कई बार आश्रम का जीर्णाद्धार हुआ, उसमें म्यूजियम बना। पूरा पैसा सरकार ने लगाया, लेकिन पूरी जवाबदेही ट्रस्ट के ही पास रही। पहली बार ऐसा हुआ कि सरकार ने कहा, आप सब हट जाओ, आपकी जरूरत नहीं है। हम अपने तरीक से फैसला करेंगे, काम करेंगे। सारे ट्रस्टी हाथ पर हाथ धरे बैठ गए। आखिर में अपनी सत्ता बचाने के लिए समर्थन भी कर दिया। 

ऐसी खोखली और पंगु संस्थाओं से यह आशा रखना कि वे देश के मामलों में आगे आएं और लड़ें, यह पूरी तरह निरर्थक है। अब न तो सर्वाेदय, न सर्व सेवा संघ, न ही किसी भी गांधीवादी संस्था का अस्तित्व ही इस लायक बचा है कि वह सामाजिक प्रश्नों, राजनीतिक प्रश्नों, देश के प्रश्नों पर काम कर सकेंगी। वहां झूठबाजी चल रही है, अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए झूठ का प्रयोग बेशर्मी से किया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि उनसे ऐसी कोई उम्मीद रखनी चाहिए कि जेपी के आंदोलन के समय जिस तरह सर्वोदय से जुड़े लोग आंदोलित हुए थे, वैसे अब हो पाएंगे। अब वैसे लोग ही नहीं रहे। 

जब खुद गांधी के प्रपौत्र यह बात कह रहे हों तो ज्यादा कुछ कहने तो बचता नहीं है। पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा है कि इस सर्व सेवा संघ की आत्मा तो बहुत पहले ही इसे छोड़कर जा चुकी थी। आत्मा के निकलने के बाद जिस तरह शरीर धीरे-धीरे गलता चला जाता है, लगभग वही हाल इस संस्थान का भी हो रहा है। तो, यह कहना ज्यादा मुफीद होगा कि 30 जून को इस मृतप्राय संस्थान काे दफना दिया जाएगा। एक मायने में यह ठीक ही है। मृत शरीर से संक्रमण ज्यादा फैलने की आशंका होती है।

लेकिन चिंता की बात तो यह है कि जहां कुछ गांधीवादी, सर्वाेदयी लोग अभी भी इसे बचाने की लगभग हार चुकी लड़ाई लड़ने की जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं कुछ गांधी और सर्वाेदययजीवी ऐसे भी हैं जो इस विध्वंस के बदले मुआवजे की मांग कर रहे हैं। यानी, गांधी और सर्वाेदयी विचारों पर बनी संस्था को खत्म करने के बदले सरकार कम से कम मुआवजा तो दे दे। गजब ही है। आश्चर्य होता है कि ऐसे लोग भी आखिर कब, क्यों और कैसे गांधी या सर्वाेदयी विचारों से जुड़े और अब तक कैसे इसका आडंबर ओढ़कर रह पाए। बहुत संभव है कि कल को ये सरकार से कहें कि अब हम आधिकारिक तौर पर गांधी विचारों को भी दफन करे हैं तो सरकार इसके बदले भी कुछ मुआवजा दे देा। और तय मानिए, सरकार खुशी-खुशी मुआवजा देने को राजी हो जाएगी।

यह अमृतकाल का स्वयोंदय है। जी हां, स्वयं का उदय। गांधी, विनोबा, जेपी जिस सर्वाेदय यानी सर्व के उदय की बात करते थे और जिनके हितों के संघर्ष करते-करते विदा हो गए, उनके बहुत से अनुयायी अब सर्वोदय से स्वयोंदय की ओर बढ़ चुके हैं। ऐसे में इन संस्थानों का बंद होना ही शायद गांधी और सर्वाेदयी विचारों को श्रद्धांजलि देने का सही मौका होगा। 


हां, निजी तौर पर यह दुख जरूर है कि मैंने अपने बचपन के सात साल उसी सर्व सेवा संघ के कैंपस में बिताएं हैं जिसे 30 जून को तोड़े जाने का नोटिस चस्पा कर दिया गया है। सामने गंगा और पीछे वरुणा को बहते देखने की याद आज भी जेहन में ताजा है। लेकिन गांधी और सर्वाेदयी विचारों की तरह यहां के भवन भी जर्जर हालत में आ चुके हैं। जब भवन पुराने, कमजोर और लाचार छोड़ दिए जाएं तो उनमें दीमक से लेकर चूहों या चमगादड़ों तक का घर बस जाता है। अब इन भवनों की जगह शायद किसी और विचार से लैस भव्य इमारतें कुछ दिनों में नजर आने लगें तो हैरानी नहीं होगी।

अब गांधीवादियों, सर्वोदयी लोगों को सरकार को यह सुझाव जरूर देना चाहिए कि इस नए निर्माण में वे कम से कम एक छोटा सा संग्रहालय जरूर बनाएं जिसमें लिखा हो निर्माण 1948,विध्वंस 2023। इस संग्रहालय में गांधी विचार से जुड़े इस शीर्ष संगठन के हिस्से रहे नेताओं के फोटो, उनकी किताबें, उनके लेख आदि भी होने चाहिएं। इनमें महात्मा गांधी, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, आचार्य कृपलानी, आचार्य विनोबा भावे, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जयप्रकाश नारायण, उनकी पत्नी प्रभावती, जेसी कुमारप्पा, आचार्य राममूर्ति,  अच्युत पटवर्धन, नारायण देसाई, विमला ठकार, निर्मला देशपांडे, कृष्णराज मेहता, शंकर राव देव जैसी हस्तियां जरूर शामिल की जाएं। विश्व विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर ई.एफ शुमाखर की किताब  `स्माल इज ब्यूटीफुल’ (Small is Beautiful ) भी इसका हिस्सा होनी चाहिए, जो उन्होंने यहीं लिखी थी।

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

पहले मशहूर शायर शहरयार की यह ग़ज़ल पढ़िए... सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है दिल है तो धड़कने...