राजधानी से बही सत्ता की यह धार हर जिले, हर थाने तक पहुंचनी चाहिए
हमने पढ़ा है कि काल तीन तरह के होते हैं। भूत काल, वर्तमान काल और भविष्य काल। इन दिनों देश की राजनीति में एक नया काल चल रहा है। यह है राजनीति का मूत काल। जी हां, आपने सही सुना। आपको याद होगा टीवी पर एक कार्यक्रम आता था, आश्चर्यजनक किंतु सत्य।
यह बिल्कुल उसी तरह का काल है, आश्चर्यजनक किंतु सत्य। और सत्य यानी सच कठोर होता है। नंगा भी होता है। बिल्कुल उसी प्रवेश शुक्ला की तरह जिसने आदिवासी युवक दशमत के सिर पर अपनी पेशाब की धार बिल्कुल उस तरह बहाई जैसे बचपन में बच्चे खेल-खेल में अक्सर बहाते रहते हैं। लेकिन प्रवेश शुक्ला बच्चा नहीं है। वह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक छुटभैया नेता है। या अब यह सकते हैं कि था। सीधी जिले के भाजपा विधायक केदारनाथ शुक्ला का प्रतिनिधि।
ऐसा माना जाता है कि विधानसभा क्षेत्रों में विधायक प्रतिनिधि का जलवा विधायक जी से भी कई गुना ज्यादा होता है। और सीधी में तो इसके कई साक्षात उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं। करीब साल भर पहले ही एक और वीडियो वायरल हुआ था। गजब संयाेग है कि उसमें भी सच को नंगा ही दिखाया गया था। तब सच दिखाने वाले पत्रकार कनिष्क तिवारी सहित नौ जवानों को पुलिसवालों ने अंडरवियर में ही थाने में बंद कर दिया था।
इनका गुनाह यह था कि इन्होंने सीधी में भाजपा विधायक के खिलाफ खबरें लिखी थीं। हैरानी वाली बात तो यह है कि प्रवेश शुक्ला के मामले में जिस तरह इनके किसी साथी ने इनकी नंगी हरकत का वीडियो बनाकर वायरल कर दिया, ठीक उसी तरह किसी पुलिस वाले ने ही तब उन पत्रकारों की अधनंगी ड्रेस वाली फोटो खींचकर वायरल कर दी थी। यह एक तरह से उनका दुस्साहस ही था कि हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा। यहां तो हमारा राज है। सरकार हमारे बाप की,पुलिस हमारे बाप की। प्रशासन हमारे बाप का, तो चलेगी भी हमारे बाप की।
उस वक्त मामला यह सामने आया था कि सीधी विधायक पं.केदारनाथ शुक्ला के विधायक पुत्र गुरुदत्त शरण पर किसी फेसबुक आईडी से टिप्पणी करने और विधायक जी के कथित भ्रष्टाचार पर खबरें लिखने से माननीय नाराज थे। बहरहाल, इससे यह तो पता चल गया कि सीधी में नाम के अलावा कुछ भी सीधा नहीं है। और इस बार तो यहां की राजनीति में भी मूत काल का प्रवेश हो गया।
अब जरा एक बार सोच कर देखते हैं कि जब प्रवेश शुक्ला आदिवासी युवक पर पेशाब कर रहा होगा, तो उसकी क्या सोच रही होगी। शायद यह सामने बैठे व्यक्ति को उसकी औकात बताने का सबसे प्रभावी तरीका माना गया हो। जैसे इन दिनों कई वायरल वीडियो में देखा जा रहा है। कोई दबंग किसी दलित से थूक कर चाटने काे कहता है तो कहीं चप्पल पहनकर घर के सामने से गुजरने पर दबंग दलितों की हड्डी तोड़ पिटाई कर देते हैं। और एक वजह यह भी हो सकती है, जैसा आरोप कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने लगाया। जिसकी सच्चाई शायद जांच के बाद सामने आए। सिंह ने कहा कि विधायक जी अपने गुर्गों की मदद से रेत का अवैध खनन करते हैं, इसका विरोध करने की वजह से सबक सिखाने के लिए यह हरकत की गई।
बहरहाल, सीधी में विधायक प्रतिनिधि रहे प्रवेश शुक्ला ने जिस तरह सत्ता के नशे में पेशाब की धार बहाई, वह कहीं से कहीं सत्ता की धार जैसी ही लग रही थी। निर्मम, संवेदनहीन, निरंकुश और दिशाहीन। और दूसरा आश्चर्यजनक किंतु सत्य का उदाहरण मध्यप्रदेश की राजधानी के सीएम हाउस में देखने को मिला, जब सूबे के मुखिया ने मूत्र विसर्जन के शिकार आदिवासी को वीआईपी दर्जा देते हुए न केवल शॉल ओढ़ाकर सम्मान दिया, बल्कि उसके पैरों को धोकर उसका पानी सिर से लगाकर आदिवासियों से माफी भी मांगी। यहां पैरों पर गिरती नजर आई सत्ता की दूसरी धार।
अब सवाल यह है कि क्या सीएम हाउस में बही सत्ता की धार, सीधी में आदिवासी के सिर पर बहाई गई सत्ता के नशे ही धार को काट पाएगी। क्या मध्यप्रदेश के आदिवासी अपने एक साथी के साथ की गई इस अमानवीय हरकत को सीएम की मेजबानी की मेहरबानी से भुला पाएंगे। इसके लिए तो अभी काफी समय है। यानी चार, पांच महीने का समय तो है ही। और जनता की याददाश्त वैसे भी काफी कमजोर होती है।
लेकिन इसके लिए राजधानी से सीएम के हाथों से आदिवासी के पैरों में बही सत्ता की यह धार अब रुकनी नहीं चाहिए। यह हर जिले, हर तहसील और हर थाने तक बहनी चाहिए। प्रदेश के हर ऐसे आदिवासी या दलित जिसके साथ किसी भी तरह का अन्याय हुआ है, उससे इसी तरह माफी मांगने की बकायदा नीति बन जानी चाहिए। जब कलेक्टर हर दिन अपने सरकारी कार्यालय में सार्वजनिक तौर पर ऐसे 5, 10 आदिवासियों, दलितों के पैर तक सत्ता की धार बहाकर उनसे माफी मांगेंगे और उन्हें न्याय दिलाने की शपथ लेंगे, हर तहसील में तहसीलदार और हर थाने में थानेदार जमीन पर बैठा मिलेगा, उनके सामने कुर्सी पर वह वंचित, उपेक्षित, पीड़ित आदिवासी, दलित बैठा दिखेगा तो सच में राम राज्य सा ही दृश्य होगा।
और ऐसा जब लगातार कुछ दिनों तक होगा, तब कहीं सरकारी प्रशासन और बड़े अधिकारियों, पुलिस के आला अफसरों से लेकर सिपाहियों तक के अंदर घर बना चुकी झूठ दंभ, अहंकार, अभिमान की भावना तड़कना और दरकना शुरू होगी। तब कहीं जाकर उनके अंदर यह सच एक छोटे से पौधे की तरह उगना शुरू होगा कि सबका मालिक मैं नहीं हूं। जनता ही जनार्दन है। असली मालिक जनता ही है। और ऐसा करना क्यों जरूरी है यह भी जान लीजिए।
तो, अब बात करते हैं मध्यप्रदेश में आदिवासियों और दलितों के साथ हो रही हिंसा पर। राजनीतिक नहीं, तथ्यात्मक चर्चा। क्योंकि सीएम ने सीएम हाउस में आदिवासी के पैर धोकर एक अलग तरह का नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है। यह बताने की कोशिश की है कि सरकार, प्रशासन आदिवासियों, दलितों के साथ है। उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। पर क्या वास्तव में जमीनी हालत ऐसी ही है। आइए देखते हैं।
पहले यह रिपोर्ट देखते हैं। पिछले साल एनसीआरबी ने देश में हो रहे अपराधों पर अपनी रिपोर्ट जारी की थी। इसका एक विश्लेषण किया था एनसीएसपीए ने। National Coalition for Strengthening SCs and STs (PoA) Act (NCSPA) देश के 500 से ज्यादा दलित और आदिवासी संस्थाओं, समूहों, कार्यकर्ताओं का संगठन है। एनसीएसपीए का मानना है कि स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों और दिशानिर्देशों के बावजूद, देश भर में दलितों और आदिवासी समुदायों की पीड़ा सबसे खराब बनी हुई है। यह समुदाय न केवल इस अभिशाप जाति व्यवस्था का शिकार है बल्कि संस्थागत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करता है।
अगर एनसीआरबी के आंकड़ों की ही बात करें तो 2021 में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ अत्याचार में 6.4% की वृद्धि हुई है। इसमें मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 29.8% मामले दर्ज हुए हैं। इस मामले में कांग्रेस शासित राजस्थान का दूसरा नंबर है। यहां 24% और ओडिशा में 7.6% मामले दर्ज किए गए हैं।
इसी तरह 2021 में अनुसूचित जाति (एससी) के खिलाफ अत्याचार या अपराध में 1.2% की वृद्धि हुई है, उत्तर प्रदेश में एससी के खिलाफ अत्याचार के सबसे अधिक मामले 25.82% दर्ज हुएए हैं, इसके बाद राजस्थान में 14.7% और मध्य प्रदेश में 14.1% की वृद्धि हुई है।
दलित और आदिवासी महिलाओं के खिलाफ हिंसा भी बढ़ी है। दर्ज कुल मामलों में से अनुसूचित जाति की महिलाओं (नाबालिगों सहित) के खिलाफ बलात्कार के मामले 7.64% और अनुसूचित जनजाति महिलाओं के खिलाफ 15% हैं। वर्ष 2021 के अंत में अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के कुल 70,818 मामलों की जांच लंबित थी, जिसमें पिछले वर्ष के मामले भी शामिल थे। इसी तरह, एसटी के खिलाफ अत्याचार के 12,159 मामले जांच के लिए लंबित थे और एससी के खिलाफ अत्याचार के कुल 2,63,512 मामले और एसटी के खिलाफ अत्याचार के 42,512 मामले अदालत में सुनवाई के लिए आए।
जाहिर है कि केवल एक आदिवासी को सीएम हाउस बुलाकर उसके पैर धोने और माफी मांगने से पाप नहीं धुलेंगे। इस मूत काल के प्रकाेप से पीछा छुड़ाने के लिए शायद महाकाल भी मदद न कर पाएं। और दुनिया भर का भूत, भविष्य बताने वाले प्रदेश की तमाम बाबा भी कितने ही अनुष्ठान, यज्ञ, सम्मेलन कर लें, यह दाग मिटा नहीं पाएंगे। शायद यह देश की राजनीति का दुर्भाग्य ही है कि उसे ऐसे समय में मूत काल से गुजरना पड़ रहा है जब पूरे देश में शौचालय और मूत्रालय बनाने का डंका गूंज रहा है। अगर सीधी में भी ऐसा ही एक मूत्रालय बन गया होता तो शायद 5 फीसदी चांस है कि मूत काल का अस्तित्व उसी में बह गया होता।
लेकिन कहते हैं ना कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है। कम से दशमत के लिए तो जो भी बुरा हुआ, उसके अच्छे के लिए हुआ। उसे सीएम हाउस जाने, उनके हाथों से अपने पैर धुलाने और उनके साथ खाना खाने का लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिल गया। कुछ लोग इसे सुदामा और कृष्ण के ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ने लगे थे। लेकिन उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि इसी महाभारत में द्रोपदी का चीरहरण अपमान का ऐसा अतिरेक था जिसके नतीजे में कौरवों को अपना सब-कुछ गंवा देना पड़ा। अब यह आदिवासी समाज पर है कि वह अपने अपमान को भुलाकर सरकार को माफ कर देगा या समय आने पर इसका जवाब देगा। या फिर सरकार कुछ ऐसे कड़े कदम उठाएगी जिससे दलित, आदिवासी के साथ हो रहे अन्याय पर रोक लगेगी और ये सरकार के होने को असल में महसूस कर सकेंगे।


No comments:
Post a Comment