आदिपुरुष… कहीं यह छवि और नैरेटिव बदलने के प्रयोग का हिस्सा तो नहीं
16 जून को रिलीज हुई फिल्म आदिपुरुष पर इसके टीजर रिलीज होने के साथ ही विवाद शुरु हो गया था। 650 करोड़ की लागत से बनी अत्याधुनिक वीएफएक्स इफेक्ट से लैस इस फिल्म को इसके कंटेंट, इसके डायलाॅग्स और इसके कैरेक्टर्स की विवादित छवि दिखाने पर घेरा जा रहा है। जाहिर है, फिल्म के निर्माता, निर्देशक और खासकर डायलाॅग राइटर आलोचकों के सीधे निशाने पर हैं। एक्टर्स को छोड़ दें, क्योंकि वे तो वही करेंगे जो फिल्म का निर्देशक उनसे करवाएगा। बहरहाल, यहां इस फिल्म का जिक्र केवल इसलिए नहीं हो रहा है कि यह किन कारणों से विवाद में है, यह जिक्र इसलिए ज्यादा जरूरी है ताकि हम यह समझ सकें कि यह मामला केवल किसी एक फिल्म से जुड़ा है या फिर इसकी जड़ें काफी गहरी हैं, और यह किसी खास सोच के साथ किए जा रहे एक प्रयोग का हिस्सा भर है। हम ऐसी अटकलें तो लगा ही सकते हैं।
दरअसल बहस का बड़ा मुद्दा यह है कि इस फिल्म से हमारे दिलों में बसी भगवान श्री राम की सौम्य, मनोहर, शांतचित्त, धीर, गंभीर और पुरुषोत्तम वाली छवि को गहरा धक्का पहुंचा है। यही इस प्रयोग का सार भी है। क्योंकि यह सारा खेल ही छवि बदलने का है। तो क्या यह माना जाए कि यह अनायास नहीं सायास है। क्या हम यह कह सकते हैं कि यह संयोग नहीं है, यह प्रयोग है। क्या इसे नैरेटिव सेट करने का प्रयोग कहा जा सकता है। हम जानते हैं कि नैरेटिव सेट करना आसान काम नहीं हे। इसके लिए लंबा समय और काफी सारी मेहनत लगती है। ऐसा किसी एक फिल्म या एक बयान या एक मंदिर या एक मस्जिद या एक धरने या एक प्रदर्शन या एक विरोध से संभव नहीं होता। इसके लिए इन तमाम जरियों और तरीकों को बार-बार, लगातार दोहराने की जरूरत होती है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अगर किसी की नई छवि बनानी हो, या किसी मुद्दे पर नया नैरेटिव सेट करना हो, तो फिर भी काम थोड़ा आसान होता है। लेकिन जब चुनौती किसी सोच, किसी विचार, किसी सिद्धांत, किसी परंपरा या किसी व्यवहार को बदलने की हो, इनके आधार पर बनी छवि को बदलने की हो, इनके आधार पर पहले से बने नैरेटिव को बदलकर नया नैरेटिव सेट करने की हो, तो यह ज्यादा कठिन काम होता है। और यह फिल्म संभवत: इसी कठिन काम को अंजाम देने के बड़े प्रयोग या बड़ी मुहिम की महज एक कड़ी मानी जा सकती है।
नया, अलग और अपने खास मकसद के लिए नैरेटिव सेट करने के इस प्रयाेग में फिल्में भी एक अहम भूमिका अदा कर रही हैं। इसकी शुरुआत शायद द कश्मीर फाइल्स से हुई थी। इस फिल्म पर भी फैक्ट से छेड़छाड़ और समाज के खास वर्ग सहित सत्ताधारी राजनीतिक हित साधने के आरोप लगाए गए। इसे नैरेटिव सेट करने के एक छोटे प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है। तत्कालीन सत्ताधारी दल के खिलाफ, मुसलमानों के खिलाफ, कश्मीर के बहाने देश के दूसरे हिस्सों के लोगों को जैसा संदेश देने की कोशिश की गई, उसमें यह काफी हद तक सफल भी रही। इस बीच फिल्म से पैसों की कितनी कमाई हुई, उसे तो केवल सरप्लस या बोनस ही मानना चाहिए। क्योंकि असली लक्ष्य या असली उद्देश्य तो शायद कुछ और ही था। ऐसा बहुत से लोग मानते हैं।
इसी लाइन पर एक और फिल्म का नाम लिया जा सकता है। यह फिल्म है द केरला स्टोरी। यह भी संभवत: नैरेटिव सेट करने की दिशा में बढ़ने वाला एकदम साफ, स्पष्ट, सोचा-समझा गया कदम था। इस फिल्म में तो निर्माता, निर्देशक से लेकर राजनेता भी खुलकर सामने आ गए। हद तो यह रही कि सेंसर बोर्ड से एडल्ट सर्टिफिकेट मिलने वाली फिल्म को कई राज्यों ने टैक्स फ्री कर दिया। ए कैटेगरी के बावजूद इस फिल्म को भिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों ने स्कूली नाबालिग लड़कियों के साथ देखा। खुलेआम, पूरी बेशर्मी के साथ। केरला स्टोरी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो फिल्म मेकर्स ने निहायत ही बेशर्मी के साथ यह माना कि फिल्म गलत फैक्ट पर आधारित है। इसमें 32 हजार लड़कियों के धर्म परिवर्तन और आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल होने की बात काल्पनिक है, इसलिए फिल्म रिलीज होने के ऐन दिन इसे बदलकर 3 लड़कियों के धर्म परिवर्तन तक सीमित कर दिया गया।
इसके बाद भी फिल्म राजनीतिक समर्थन के साथ देश भर में देखी, दिखाई गई। हो सकता है कि इसका मकसद यह रहा हो कि नैरेटिव सेट करने में कोई दिक्कत न हो। हम यह भी कह सकते हैं कि फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट करने का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा। तो क्या हमें यह मानना चाहिए कि 72 हूरें और अजमेर 92 इसी कड़ी की आगामी फिल्में हैं जो खास कौम के प्रति नफरत की सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचने की राजनीतिक कामना पूरी करने में मदद करेंगी। ऐसा कहना अभी शायद जल्दबाजी होगी। हमें इन फिल्मों के आने और उसके लोगों पर पड़ने वाले असर का इंतजार करना चाहिए।
बहरहाल, हमने बात शुरू की थी छवि बदलने की। आदिपुरुष फिल्म में गुस्से वाले, नाराज दिख रहे, आक्रामक तेवर राम की छवि अनायास नहीं है। यह जानबूझकर ऐसी बनाई गई है। ताकि लोगों को यह पता चले कि सबके मन में बसे राम असल में वैसे नहीं हैं जैसा हम मानते आए हैं। वे केवल सहनशील और धैर्यवान नहीं हैं। अयोध्या के राजा हाेते हुए भी संन्यासी की तरह जीवन बिताने वाले राम का जीवन उनकी सहनशीलता को दिखाता है। यह भी कि वे केवल दयालु स्वभाव के नहीं थे। उन्होंने दया कर अपने निकट आए सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उन्होंने सभी को आगे बढ़ कर नेतृत्व करने का अधिकार दिया। सुग्रीव को राज्य दिलाना उनके दयालु स्वभाव का ही प्रतीक है।
यही नहीं, उन्होंने हर जाति, हर वर्ग यानी किसी तरह के भेदभाव से इतर मित्रता को निभाना भी सिखाया। केवट हो या सुग्रीव, निषादराज हों या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेले। इसके साथ ही श्री राम एक कुशल प्रबंधक और नेतृत्वकर्ता भी थे, जिस वजह से लंका जाने के लिए पत्थरों का सेतु बन पाया। भाई के प्रति प्रेम, त्याग और समर्पण की मिसाल भी राम से मिलती है। इसी वजह से भरत ने श्री राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता की सेवा की। इन्हीं वजहों से राम को पुरुषोत्तम माना गया।
लेकिन उनकी इन तमाम गुणों से लैस छवि शायद वर्तमान फिल्मकारों, शासकों, सत्ताधीशों को रास नहीं आई। क्योंकि ये गुण सत्ता में बने रहने के लिए अब व्यावहारिक नहीं लग रहे। इसलिए अब नए राम नए गुणों के साथ बनाए जाने लगे हैं। नए राम अपने दुश्मन को केवल मारते ही नहीं हैं, वे अपनी नाराजगी, अपना क्रोध, अपना बल सार्वजनिक रूप से प्रकट भी करते हैं।

यह सत्ता के साथ मिलनी वाली जिम्मेदारी की मौजूदा या कम से कम ऐसी मान्यता वाली छवि से इतर सत्ता की ताकत, उसके घमंड, उसके अहंकार के सार्वजनिक प्रदर्शन की नई छवि बनाने की कवायद का हिस्सा है। कुछ ऐसा ही प्रयोग हुआ था जब पिछले साल नई संसद में देश के प्रतीक चिन्ह सारनाथ के सिंहों की स्थापना की गई थी। विपक्ष सहित देश के कई लोगों ने नई संसद में लगे सिंहों की आक्रामक मुद्रा पर आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि यह सारनाथ में रखे गए मूल प्रतीक से अलग है। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह प्रतीक चिन्ह कानूनन सही है। और जहां तक शेर के आक्रामक मुद्रा में होने की बात है, तो वह देखने वाले की सोच पर निर्भर करता है।
याचिकाकर्ताओं की यह भी दलील थी कि नई संसद के शेर ज्यादा उग्र दिख रहे हैं, उनके मुंह खुले हुए हैं, जिसमें नुकीले दांत दिख रहे हैं। इस पर जस्टिस एमआर शाह और कृष्ण मुरारी की बेंच ने कहा कि अगर शेर किसी को उग्र दिख रहा है तो यह उसकी अपनी सोच हो सकती है। इस याचिका के खारिज होने से इतर जो असली मुद्दा था वह इस पर हुई राजनीतिक बयानबाजी से सामने आया। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने कहा कि यह पुराने भारत का नहीं, नए भारत का शेर है। यह सौम्य नहीं हो सकता, यह आक्रामक ही होगा। जाहिर है कि शेरों का आक्रामक होना भी अनायास नहीं सायास था। यह भी सत्ता के बदलते चरित्र और उसकी छवि के नए नैरेटिव से जुड़ा प्रयोग था।
इन तमाम प्रयोगों से जनता को संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि केवल सत्ता ही नहीं बदली है, उसकी सोच, उसके तेवर, उसकी छवि, उसके काम करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। अगर हम सरकार या सत्ता के आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी जिम्मेदारियों या जनता की राेजमर्रा की समस्याओं के समाधान में सरकारी भूमिका की बात करें तो सरकार कितना ही अच्छा काम कर ले, जनता के बीच उसकी छवि वैसी नहीं बन पाती, जैसी वर्तमान सरकार या सत्ता चाहती है।
पारंपरिक सरकार या सत्ता की छवि के साथ जनता का जुड़ाव अक्सर अपनी पसंद, नापसंद या अपनी जरूरतों के पूरा होने पर निर्भर करता है। इसी वजह से सरकारें बदलती भी रहती हैं। हो सकता है कि इसी छवि को अब सरकार बदलना चाह रही हो। शायद वह जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अगर यह सरकार बदली तो जनता के सामने धर्म, राष्ट्र, अस्मिता, इज्जत, पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा। अगर उसे नई पहचान वाला, उग्र, आक्रामक, दुश्मनों के सिर पर सवार होने वाला, दुश्मनों का संहारक, अपनी शर्तों पर काम करने वाला शासक चाहिए जिससे कहीं न कहीं उसके अहं को भी पूरा करने का मौका मिलता हो तो उसे इसी सरकार को बनाए रखना होगा।
जाहिर है कि यह संदेश किसी एक रैली, एक बयान, एक घटना, एक विरोध प्रदर्शन या एक फिल्म से नहीं दिया जा सकता। यह नैरेटिव बदलने का काम है। इसके लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत होती है। स्कूली कोर्स से गांधी को हटाने या डार्विन को बाहर करने से लेकर मुगल सराय, मुगल गार्डन या फैजाबाद का नाम बदलने, आदिपुरुष में हनुमान को बजरंग कहलाने, नई संसद बनाने और उसमें खूंखार शेरों का प्रतीक चिन्ह स्थापित करने और इतिहास के पुनर्लेखन से लेकर बुलेट ट्रेन वाले भारत के भविष्य की अलग छवि बनाने तक की कवायद इसमें शामिल है।
इससे समाज को कितना फायदा या नुकसान होगा, इसके लिए हमें कहीं बाहर जाने या किसी रिसर्च रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। आप अपने घर के अन्य सदस्यों से बात कर सकते हैं या अपनी सोसायटी के वॉट्सएप ग्रुप में चल रही बहस पर नजर डाल सकते हैं, अंतर नजर आ जाएगा। यह देश हमारा और आपका है, इसके अच्छे- बुरे का फैसला भी हमको और आपको ही करना है।























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