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Sunday, June 18, 2023

आदिपुरुष… कहीं यह नैरेटिव बदलने के प्रयोग का हिस्सा तो नहीं

आदिपुरुष… कहीं यह छवि और नैरेटिव बदलने के प्रयोग का हिस्सा तो नहीं




16 जून को रिलीज हुई फिल्म आदिपुरुष पर इसके टीजर रिलीज होने के साथ ही विवाद शुरु हो गया था। 650 करोड़ की लागत से बनी अत्याधुनिक वीएफएक्स इफेक्ट से लैस इस फिल्म को इसके कंटेंट, इसके डायलाॅग्स और इसके कैरेक्टर्स की विवादित छवि दिखाने पर घेरा जा रहा है। जाहिर है, फिल्म के निर्माता, निर्देशक और खासकर डायलाॅग राइटर आलोचकों के सीधे निशाने पर हैं। एक्टर्स को छोड़ दें, क्योंकि वे तो वही करेंगे जो फिल्म का निर्देशक उनसे करवाएगा। बहरहाल, यहां इस फिल्म का जिक्र केवल इसलिए नहीं हो रहा है कि यह किन कारणों से विवाद में है, यह जिक्र इसलिए ज्यादा जरूरी है ताकि हम यह समझ सकें कि यह मामला केवल किसी एक फिल्म से जुड़ा है या फिर इसकी जड़ें काफी गहरी हैं, और यह किसी खास सोच के साथ किए जा रहे एक प्रयोग का हिस्सा भर है। हम ऐसी अटकलें तो लगा ही सकते हैं।

 

दरअसल बहस का बड़ा मुद्दा यह है कि इस फिल्म से हमारे दिलों में बसी भगवान श्री राम की सौम्य, मनोहर, शांतचित्त, धीर, गंभीर और पुरुषोत्तम वाली छवि को गहरा धक्का पहुंचा है। यही इस प्रयोग का सार भी है। क्योंकि यह सारा खेल ही छवि बदलने का है। तो क्या यह माना जाए कि यह अनायास नहीं सायास है। क्या हम यह कह सकते हैं कि यह संयोग नहीं है, यह प्रयोग है। क्या इसे नैरेटिव सेट करने का प्रयोग कहा जा सकता है। हम जानते हैं कि नैरेटिव सेट करना आसान काम नहीं हे। इसके लिए लंबा समय और काफी सारी मेहनत लगती है। ऐसा किसी एक फिल्म या एक बयान या एक मंदिर या एक मस्जिद या एक धरने या एक प्रदर्शन या एक विरोध से संभव नहीं होता। इसके लिए इन तमाम जरियों और तरीकों को बार-बार, लगातार दोहराने की जरूरत होती है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अगर किसी की नई छवि बनानी हो, या किसी मुद्दे पर नया नैरेटिव सेट करना हो, तो फिर भी काम थोड़ा आसान होता है। लेकिन जब चुनौती किसी सोच, किसी विचार, किसी सिद्धांत, किसी परंपरा या किसी व्यवहार को बदलने की हो, इनके आधार पर बनी छवि को बदलने की हो, इनके आधार पर पहले से बने नैरेटिव को बदलकर नया नैरेटिव सेट करने की हो, तो यह ज्यादा कठिन काम होता है। और यह फिल्म संभवत: इसी कठिन काम को अंजाम देने के बड़े प्रयोग या बड़ी मुहिम की महज एक कड़ी मानी जा सकती है।

नया, अलग और अपने खास मकसद के लिए नैरेटिव सेट करने के इस प्रयाेग में फिल्में भी एक अहम भूमिका अदा कर रही हैं। इसकी शुरुआत शायद द कश्मीर फाइल्स से हुई थी। इस फिल्म पर भी फैक्ट से छेड़छाड़ और समाज के खास वर्ग सहित सत्ताधारी राजनीतिक हित साधने के आरोप लगाए गए। इसे नैरेटिव सेट करने के एक छोटे प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है। तत्कालीन सत्ताधारी दल के खिलाफ, मुसलमानों के खिलाफ, कश्मीर के बहाने देश के दूसरे हिस्सों के लोगों को जैसा संदेश देने की कोशिश की गई, उसमें यह काफी हद तक सफल भी रही। इस बीच फिल्म से पैसों की कितनी कमाई हुई, उसे तो केवल सरप्लस या बोनस ही मानना चाहिए। क्योंकि असली लक्ष्य या असली उद्देश्य तो शायद कुछ और ही था। ऐसा बहुत से लोग मानते हैं।



इसी लाइन पर एक और फिल्म का नाम लिया जा सकता है। यह फिल्म है द केरला स्टोरी। यह भी संभवत: नैरेटिव सेट करने की दिशा में बढ़ने वाला एकदम साफ, स्पष्ट, सोचा-समझा गया कदम था। इस फिल्म में तो निर्माता, निर्देशक से लेकर राजनेता भी खुलकर सामने आ गए। हद तो यह रही कि सेंसर बोर्ड से एडल्ट सर्टिफिकेट मिलने वाली फिल्म को कई राज्यों ने टैक्स फ्री कर दिया। ए कैटेगरी के बावजूद इस फिल्म को भिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों ने स्कूली नाबालिग लड़कियों के साथ देखा। खुलेआम, पूरी बेशर्मी के साथ। केरला स्टोरी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो फिल्म मेकर्स ने निहायत ही बेशर्मी के साथ यह माना कि फिल्म गलत फैक्ट पर आधारित है। इसमें 32 हजार लड़कियों के धर्म परिवर्तन और आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल होने की बात काल्पनिक है, इसलिए फिल्म रिलीज होने के ऐन दिन इसे बदलकर 3 लड़कियों के धर्म परिवर्तन तक सीमित कर दिया गया।

 

इसके बाद भी फिल्म राजनीतिक समर्थन के साथ देश भर में देखी, दिखाई गई। हो सकता है कि इसका मकसद यह रहा हो कि नैरेटिव सेट करने में कोई दिक्कत न हो। हम यह भी कह सकते हैं कि फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट करने का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा। तो क्या हमें यह मानना चाहिए कि 72 हूरें और अजमेर 92 इसी कड़ी की आगामी फिल्में हैं जो खास कौम के प्रति नफरत की सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचने की राजनीतिक कामना पूरी करने में मदद करेंगी। ऐसा कहना अभी शायद जल्दबाजी होगी। हमें इन फिल्मों के आने और उसके लोगों पर पड़ने वाले असर का इंतजार करना चाहिए।



बहरहाल, हमने बात शुरू की थी छवि बदलने की। आदिपुरुष फिल्म में गुस्से वाले, नाराज दिख रहे, आक्रामक तेवर राम की छवि अनायास नहीं है। यह जानबूझकर ऐसी बनाई गई है। ताकि लोगों को यह पता चले कि सबके मन में बसे राम असल में वैसे नहीं हैं जैसा हम मानते आए हैं। वे केवल सहनशील और धैर्यवान नहीं हैं। अयोध्या के राजा हाेते हुए भी संन्यासी की तरह जीवन बिताने वाले राम का जीवन उनकी सहनशीलता को दिखाता है। यह भी कि वे केवल दयालु स्वभाव के नहीं थे। उन्होंने दया कर अपने निकट आए सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उन्होंने सभी को आगे बढ़ कर नेतृत्व करने का अधिकार दिया। सुग्रीव को राज्य दिलाना उनके दयालु स्वभाव का ही प्रतीक है।

यही नहीं, उन्होंने हर जाति, हर वर्ग यानी किसी तरह के भेदभाव से इतर मित्रता को निभाना भी सिखाया। केवट हो या सुग्रीव, निषादराज हों या विभीषण सभी मित्रों के लिए उन्होंने स्वयं कई बार संकट झेले। इसके साथ ही श्री राम एक कुशल प्रबंधक और नेतृत्वकर्ता भी थे, जिस वजह से लंका जाने के लिए पत्थरों का सेतु बन पाया। भाई के प्रति प्रेम, त्याग और समर्पण की मिसाल भी राम से मिलती है। इसी वजह से भरत ने श्री राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता की सेवा की। इन्हीं वजहों से राम को पुरुषोत्तम माना गया।



लेकिन उनकी इन तमाम गुणों से लैस छवि शायद वर्तमान फिल्मकारों, शासकों, सत्ताधीशों को रास नहीं आई। क्योंकि ये गुण सत्ता में बने रहने के लिए अब व्यावहारिक नहीं लग रहे। इसलिए अब नए राम नए गुणों के साथ बनाए जाने लगे हैं। नए राम अपने दुश्मन को केवल मारते ही नहीं हैं, वे अपनी नाराजगी, अपना क्रोध, अपना बल सार्वजनिक रूप से प्रकट भी करते हैं।

                         

यह सत्ता के साथ मिलनी वाली जिम्मेदारी की मौजूदा या कम से कम ऐसी मान्यता वाली छवि से इतर सत्ता की ताकत, उसके घमंड, उसके अहंकार के सार्वजनिक प्रदर्शन की नई छवि बनाने की कवायद का हिस्सा है। कुछ ऐसा ही प्रयोग हुआ था जब पिछले साल नई संसद में देश के प्रतीक चिन्ह सारनाथ के सिंहों की स्थापना की गई थी। विपक्ष सहित देश के कई लोगों ने नई संसद में लगे सिंहों की आक्रामक मुद्रा पर आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि यह सारनाथ में रखे गए मूल प्रतीक से अलग है। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह प्रतीक चिन्ह कानूनन सही है। और जहां तक शेर के आक्रामक मुद्रा में होने की बात है, तो वह देखने वाले की सोच पर निर्भर करता है।


 

याचिकाकर्ताओं की यह भी दलील थी कि नई संसद के शेर ज्यादा उग्र दिख रहे हैं, उनके मुंह खुले हुए हैं, जिसमें नुकीले दांत दिख रहे हैं। इस पर जस्टिस एमआर शाह और कृष्ण मुरारी की बेंच ने कहा कि अगर शेर किसी को उग्र दिख रहा है तो यह उसकी अपनी सोच हो सकती है। इस याचिका के खारिज होने से इतर जो असली मुद्दा था वह इस पर हुई राजनीतिक बयानबाजी से सामने आया। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने कहा कि यह पुराने भारत का नहीं, नए भारत का शेर है। यह सौम्य नहीं हो सकता, यह आक्रामक ही होगा। जाहिर है कि शेरों का आक्रामक होना भी अनायास नहीं सायास था। यह भी सत्ता के बदलते चरित्र और उसकी छवि के नए नैरेटिव से जुड़ा प्रयोग था।

 

इन तमाम प्रयोगों से जनता को संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि केवल सत्ता ही नहीं बदली है, उसकी सोच, उसके तेवर, उसकी छवि, उसके काम करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है। अगर हम सरकार या सत्ता के आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी जिम्मेदारियों या जनता की राेजमर्रा की समस्याओं के समाधान में सरकारी भूमिका की बात करें तो सरकार कितना ही अच्छा काम कर ले, जनता के बीच उसकी छवि वैसी नहीं बन पाती, जैसी वर्तमान सरकार या सत्ता चाहती है।

पारंपरिक सरकार या सत्ता की छवि के साथ जनता का जुड़ाव अक्सर अपनी पसंद, नापसंद या अपनी जरूरतों के पूरा होने पर निर्भर करता है। इसी वजह से सरकारें बदलती भी रहती हैं। हो सकता है कि इसी छवि को अब सरकार बदलना चाह रही हो। शायद वह जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अगर यह सरकार बदली तो जनता के सामने धर्म, राष्ट्र, अस्मिता, इज्जत, पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा। अगर उसे नई पहचान वाला, उग्र, आक्रामक, दुश्मनों के सिर पर सवार होने वाला, दुश्मनों का संहारक, अपनी शर्तों पर काम करने वाला शासक चाहिए जिससे कहीं न कहीं उसके अहं को भी पूरा करने का मौका मिलता हो तो उसे इसी सरकार को बनाए रखना होगा।

जाहिर है कि यह संदेश किसी एक रैली, एक बयान, एक घटना, एक विरोध प्रदर्शन या एक फिल्म से नहीं दिया जा सकता। यह नैरेटिव बदलने का काम है। इसके लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत होती है। स्कूली कोर्स से गांधी को हटाने या डार्विन को बाहर करने से लेकर मुगल सराय, मुगल गार्डन या फैजाबाद का नाम बदलने, आदिपुरुष में हनुमान को बजरंग कहलाने, नई संसद बनाने और उसमें खूंखार शेरों का प्रतीक चिन्ह स्थापित करने और इतिहास के पुनर्लेखन से लेकर बुलेट ट्रेन वाले भारत के भविष्य की अलग छवि बनाने तक की कवायद इसमें शामिल है। 

इससे समाज को कितना फायदा या नुकसान होगा, इसके लिए हमें कहीं बाहर जाने या किसी रिसर्च रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। आप अपने घर के अन्य सदस्यों से बात कर सकते हैं या अपनी सोसायटी के वॉट्सएप ग्रुप में चल रही बहस पर नजर डाल सकते हैं, अंतर नजर आ जाएगा। यह देश हमारा और आपका है, इसके अच्छे- बुरे का फैसला भी हमको और आपको ही करना है।



Friday, June 16, 2023

Adipurush… कहानी, सीन, डायलॉग, चरित्र सब पर विवाद… फिर कोर्ट पहुंची फिल्म, अरुण गोविल बोले- आस्था से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं...

टीजर से शुरु हुआ विवाद फिल्म के रिलीज तक जारी, क्या होगा Adipurush का भविष्य





बहुचर्चित फिल्म Adipurush 16 जून को रिलीज हो गई। पहले यह 12 जनवरी को रिलीज होनी थी। लेकिन अक्टूबर में जारी टीजर के साथ फिल्म से जुड़े विवादों का सिलसिला शुरू हो गया था। इस वजह से फिल्म की रिलीज डेट 12 जनवरी से मई तक के लिए आगे बढ़ा दी गई थी। आखिरकार यह 16 जून को देश भर में रिलीज की गई।



अंतत: फिल्म तमाम विवादों के साथ रिलीज हुई। थियेटरों में एक सीट हनुमान जी के लिए आरक्षित रखने, सीट पर सीता, राम, हनुमान की फोटो रखने, उसकी पूजा करने के टोटकों के साथ करीब 650 करोड़ की लागत वाली फिल्म की भव्य शुरुआत भी हो गई।


दावे किए गए कि यह इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म बनेगी। इसके एडवांस टिकट बुकिंग के आंकड़ों ने भी पठान को पीछे छोड़ दिया… पहले दिन की कमाई भी करीब 140 करोड़ हो गई है। इसलिए तमाम विवादों के बीच मनोज मुंतशिर ने इस कमाई के लिए देश का आभार जताया है।


इसके बाद शुरू हुआ दर्शकों की प्रतिक्रिया का दौर। फिल्म का पहला शो खत्म होने के बाद बाहर निकले दर्शकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही। कुछ संतुष्ट नजर आए, वहीं बड़ी संख्या ऐसे दर्शकों की रही जो फिल्म देखने बड़ी उम्मीद से गए थे, पर बाहर निकलते समय उनका गुस्सा, उनकी झल्लाहट यह बता रही थी, कि फिल्म में सबकुछ वैसा नहीं है, जैसा बताया जा रहा था।


और कुछ ही देर में सोशल मीडिया में बॉयकाटआदिपुरुष से लेकर फिल्म के निर्माता, निर्देशक, कवि सभी निशाने पर आ गए। और शाम होते-होते फिल्म के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका भी दाखिल हो गई। यही नहीं रामायण सीरियल के लक्षमण के बाद श्री राम यानी अरुण गोविल भी इस फिल्म से नाराज दिखे। एक वीडियो जारी कर उन्होंने साफ-साफ कहा कि हमारी आस्था से छेड़छाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है। नीचे देखिए पूरा वीडियो...


आइए.. इस ऐतिहासिक कही, मानी जा रही फिल्म के इतिहास, वर्तमान और भविष्य पर एक नजर डालते हैं। 

पहले फिल्म की बुनियादी जानकारी

आदिपुरुष एक बॉलीवुड फिल्म है, जो कथित तौर पर रामायण महाकाव्य से प्रेरित बताई जा रही है। यह फिल्म ओम राउत द्वारा निर्देशित और टी-सीरीज़ फिल्म्स और रेट्रोफाइल्स द्वारा निर्मित है। हिंदी और तेलुगु भाषाओं में इस फिल्म को एक साथ फिल्माया गया है। फिल्म में प्रभास राघव यानी राम, कृति सेनन जानकी यानी सीता और सैफ अली खान लंकेश यानी रावण के रूप में हैं। फिल्म के डायलॉग मुंतशिर मनोज शुक्ला ने लिखे हैं। 


आदिपुरुष फिल्‍म के रिलीज होने के साथ ही विरोध भी शुरू हो गया है। आदिपुरुष देखकर लौटे दर्शकों ने इसके कुछ डायलॉग सोशल मीडिया पर डाले, इसके बाद विरोध और बढ़ गया। आइए ऐसे कुछ डायलॉग देखते हैं…

"कपड़ा तेरे बाप का! तेल तेरे बाप का! जलेगी भी तेरे बाप की"
"तेरी बुआ का बगीचा है क्या जो हवा खाने चला आया"
"जो हमारी बहनों को हाथ लगाएंगे उनकी लंका लगा देंगे"
"आप अपने काल के लिए कालीन बिछा रहे हैं"
"मेरे एक सपोले ने तुम्हारे शेषनाग को लंबा कर दिया अभी तो पूरा पिटारा भरा पड़ा है"।

जाहिर है कि आदिपुरुष के अबतक सामने आए रिव्‍यू में लोगों का कहना है कि फिल्‍म में कई जगह ऐसी भाषा का प्रयोग हुआ है जो भगवान श्रीराम और रामायण के वक्‍त पर त्रेता युग में इस्‍तेमाल होने वाली भाषा से मेल नहीं खाती है। एक जगह फिल्‍म में डायलॉग का इस्‍तेमाल किया गया है, ‘तेरी जली ना?’ इसी तरह एक अन्‍य जगह लाइन का इस्‍तेमाल हुआ है ‘तेल तेरे बाप का आग तेरे बाप की…’. यही वजह है कि करीब 500 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्‍म के शुरुआती रिव्‍यू अच्‍छे नहीं रहे हैं।
इस फिल्म के डायलॉग्स के लिए मशहूर कवि, लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला की काफी आलोचना हो रही है। वहीं उनका यह कहना है कि इस भाषा में रामायण बड़े बड़े संत सुनाते हैं और दादी-नानी भी अपने बच्चों को इसी भाषा में रामायण सुनाया करती थीं।
आइए देखते हैं.. कुछ जाने-माने फिल्म आलोचक इस बारे में क्या राय रखते हैं। 

अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, यह आदिपुरुष बाल्मीकि रामायण को कतई नहीं

निश्चित ही अशोक वाटिका बजरंग की बुआ का बगीचा नहीं था। और यह #आदिपुरुष बाल्मीकि रामायण तो कतई ही नहीं है। यह ओम राऊत और मनोज मुंतशिर की रामायण है, जिसमें राघव, शेष, जानकी और बजरंग यंत्रचालित किरदार हैं। https://youtu.be/wMyxpyfXdsk बाकी आप मेरी राय सुन लीजिए।

तरन आदर्श ने ऐतिहासिक दुर्भाग्य बताया

कुछ ऐसा ही रिव्यू taran adarsh का भी है। वे इसे आधा स्टार देते हुए कहते हैं कि यह ऐतिहासिक दुर्भाग्य है।   
#OneWordReview... #Adipurush: DISAPPOINTING. Rating: ½ #Adipurush is an EPIC DISAPPOINTMENT… Just doesn’t meet the mammoth expectations… Director #OmRaut had a dream cast and a massive budget on hand, but creates a HUGE MESS. #AdipurushReview

पढ़िए, कीर्ति आजाद की राय

इसी तरह राजनेता और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद कहते हैं कि राजीव गाँधी जी के समय बनाये गये रामायण और मोदी के समय बनवाये गये रामायण #आदिपुरूष के पात्र और डायलॉग को सुने तो समझ आता है सभ्यता और संस्कृति, मान और अपमान किसे कहते हैं। आदिपुरुष ने ऐसे बताया है की वाल्मीकि जी ने रामायण में काफ़ी ग़लतियाँ की थी, उन ग़लतियों को सुधारा गया है… विस्तार से पढ़िए..

कीर्त आजाद ने फिल्म के कुछ डायलॉग भी शेयर किए..



इसी तरह फिल्म को लेकर मीम का सिलसिला भी शुरू हो गया हैं। देखते हैं, इससे जुड़े कुछ मीम्स। 



इस तरह भी दर्शकों ने फिल्म के रिव्यू किए...देखिए यह वीडियो


इन तमाम वजहों से शाम होते-होते फिल्म का विवाद इसे दिल्ली हाई कोर्ट तक ले गया। विरोध करने वाले मुसलिम या अर्बन नक्सल नहीं बल्कि हिन्‍दू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता हैं। उनका कहना है कि फिल्‍म में भगवान श्रीराम का मजाक उड़ाया गया है। लिहाजा दिल्‍ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाकर फिल्‍म को बैन करने की मांग की गई है। हिन्‍दू सेना के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष विष्‍णु गुप्‍ता चाहते हैं कि हाई कोर्ट सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्‍म सर्टिफिकेशन (CBFC) को यह आदेश दें कि इस फिल्‍म को सर्टिफिकेट ना दिया जाए।


जनहित याचिका में कहा गया कि महार्षि वाल्मीकि और संत तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामायण में भगवान श्रीराम को जिस तरह से दिखाया गया है, यह फिल्‍म उससे मेल नहीं खाती। लिहाजा इस फिल्‍म से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। याचिका में कहा गया कि पेश मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से भी संपर्क किया गया था लेकिन उन्‍होंने इसपर दिलचस्‍पी नहीं दिखाई। जिसके बाद उनके पास अदालत में जनहित याचिका लगाने के अलावा अन्‍य कोई रास्‍ता नहीं बचा था।

याचिका में यह भी कहा गया कि फिल्‍म में रावण की भूमिका निभा रहे सैफ अली खान और हनुमान का चरित्र भी भारतीय सभ्‍यता से मेल खाता नहीं दिखता है। रावण एक ब्राह्मण थे। लेकिन जिस तरह से दाढ़ी वाला भयंकर लुक रावण को दिया गया है वो भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला है। रामायण की असल कहानी से ये जरा भी मेल नहीं खाता है। 


याचिका के मुताबिक “फिल्म #आदिपुरुष द्वारा हिंदू धार्मिक शख्सियतों का विकृत सार्वजनिक प्रदर्शन अंतःकरण और अभ्यास की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है, साथ ही अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता का भी उल्लंघन है।
दलील में यह भी कहा गया है कि फिल्म निर्माताओं को केंद्र सरकार और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा किसी भी फीचर फिल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है " क्योंकि यह सार्वजनिक व्यवस्था और समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बिगाड़ सकती है।"

विवादों से आदिपुरुष का रिश्ता

राम कथा पर आधारित इस फ़िल्म को रावण से लेकर सीता समेत दूसरे किरदारों के फिल्मांकन पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस फिल्म पर विवाद भारत में ही नहीं, पड़ोसी देशों तक पहुंच गया है। इसमें सीता के किरदार से जुड़े एक डायलॉग पर नेपाल में विवाद हो गया है। इस फ़िल्म में सीता को ‘भारत की बेटी’ बताया गया है। नेपाल की राजधानी काठमांडु के मेयर ने इसी डायलॉग पर आपत्ति जताई। बालेंद्र शाह 'बालेन' ने फिल्म निर्माताओं से कहा कि वे अपनी फ़िल्म में से इस डायलॉग को हटा दें। क्याकि नेपाल दावा करता आया है कि पौराणिक किरदार सीता का जन्म नेपाल के जनकपुर में हुआ था इसी वजह से नेपाल में फिल्म के इस डायलॉग पर विवाद खड़ा हुआ है।


काठमांडु मेयर बालेंद्र शाह ‘बलेन’ ने कहा कि ‘जब तक आदिपुरुष में से सीता को भारत की बेटी बताने वाला संवाद हटाया नहीं जाएगा तब तक किसी भी हिंदी फ़िल्म को काठमांडु मेट्रोपॉलिटन सिटी में नहीं चलने दिया जाएगा। इस चेतावनी के बाद फिल्म मेकर्स ने इस हिस्से को काटा। इसके बाद ही नेपाल सेंसर बोर्ड की ओर से फिल्म को वहां रिलीज की अनुमति दी गई।

टीजर के रिलीज हाेते ही विवादों की शुरुआत



2 अक्टूबर को अयोध्या में आदिपुरुष का टीजर रिलीज किया गया था। उसके बाद ही फिल्म में राम (प्रभास) और रावण (सैफ अली खान) के किरदारों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। तब उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने आदिपुरुष के टीजर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सनातन धर्म में किसी को बदलाव की अनुमति नहीं है। उन्होंने सैफ अली खान के रावण लुक पर भी अपनी नाराजगी व्यक्त की।


दरअसल आदिपुरुष में सैफ के रावण वाले लुक को लेकर सबसे ज्यादा बखेड़ा खड़ा हुआ। मशहूर एक्ट्रेस और राजनेता मालविका अविनाश के अनुसार आदिपुरुष में रावण का किरदार इतिहास के आधार पर नहीं है। जिसे देख कर मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म निर्माताओं ने अधिक शोध नहीं किया है।


इसके अलावा मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने आदिपुरुष के टीजर में हनुमान जी के पहनावे में चमड़े का वस्त्र देखकर नाराजगी जताई थी। उनके मुताबिक फिल्म के टीजर में राम, रावण और हनुमान का लुक और पहनावा बेहद गलत है।

विवाद से आगे बढ़ी आदिपुरुष की रिलीज डेट

आदिपुरुष' को लेकर शुरू विवाद के चलते फिल्म की रिलीज डेट को आगे खिसका दिया गया। प्रभास, कृति सेनन, सैफ अली खान और सनी कौशल की 'आदिपुरुष' 12 जनवरी 2023 के लिए शेड्यूल थी। 12 जनवरी को रिलीज के पोस्टर जारी के बावजूद इसकी रिलीज मई तक के लिए टाल दी गई थी। आखिरकार यह 16 जून को रिलीज हुई। इसी तरह टीजर के रिलीज होते ही 'आदिपुरुष' के वीएफएक्स (Adipurush VFX) पर विवाद हुआ था। इस वजह से इसे नए सिरे से क्रिएट करने की तैयारी की गई थी।


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म के वीएफएक्स के लिए मेकर्स ने 100 करोड़ का एडिशनल बजट अलॉट करना तय किया। ताकि इसके रिक्रिएशन पर काम किया जा सके और तमाम विवादों से बचा जा सके। इसका मतलब ये कि 'आदिपुरुष' का कुल बजट 600 करोड़ के पार है। पहले ही मेकर्स इसे बनाने में 500 करोड़ (Adipurush Budget) की भारी भरकम रकम खर्च कर चुके थे।


रावण के किरदार में सैफ अली खान और श्रीराम के रोल में प्रभास के सीन्स को री-शूट नहीं बल्कि सीन्स को रिक्रिएट किया जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे रोबोट 2.0 के समय भी डायरेक्टर शंकर ने किया था।

पोस्टर पर विवाद, थाने में शिकायत भी हुई

आदिपुरूष का हाल ही में रिलीज नए पोस्टर में प्रभास को राम, कृति सेनन को सीता, सनी सिंह को लक्ष्मण और देवदत्त को हनुमान के कैरेक्टर में देखा गया। लेकिन इस पर विवाद हो गया। मुंबई के साकीनाका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई है कि पोस्टर ने हिंदू धर्म की धार्मिक भावनाओं को पहुंचाया है। फिल्म के डायेरेक्टर ओम राउत, प्रोड्यूसर भूषण कुमार और एक्टर्स के नाम पर संजय दीनानाथ तिवारी ने यह शिकायत दर्ज कराई। वे खुद को सनातन धर्म का प्रचारक बताते हैं।

जनेऊ न पहनने की भी शिकायत की गई 



आदिपुरुष के नए पोस्टर के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट के एडवोकेट आशीष राय और पंकज मिश्रा के माध्यम से भी एक शिकायत दर्ज करवाई गई। शिकायत में बताया गया है, कि फिल्म निर्माता ने हिंदी धर्म ग्रंथ "रामचरितमानस" के पात्र को अनुचित तरह से दर्शाया है। बॉलीवुड फिल्म "आदिपुरुष" के नए रिलीज पोस्टर में हिंदू धर्म समाज के धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया है। यह शिकायत भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए), 298, 500, 34 के तहत FIR दर्ज करने की मांग के साथ दर्ज करवाई गई है।
शिकायत में बताया गया है कि 'आदिपुरुष' फिल्म हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ "रामचरितमानस" मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवनी पर बनाई गई है।  इस पवित्र ग्रंथ "रामचरितमानस" का सनातनी धर्म कई युगों से अनुसरण करते आ रहे हैं। हिंदू धर्म में "रामचरितमानस" में उल्लेख मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी एवं सभी पूजनीय पात्रों का विशेष महत्व है। शिकायतकर्ता ने बताया कि बॉलीवुड फिल्म आदिपुरुष के रिलीज पोस्टर में रामायण के सभी एक्टर्स को बगैर जनेऊ धारण किए ही दिखाया गया है।. जो कि गलत है।.

लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ने की चेतावनी



रिलीज किए गए पोस्टर में कृति सेनन को अविवाहित महिला के तौर पर बगैर सिंदूर के साथ दिखाया गया।. इससे यह साफ है कि उन्हें अविवाहित महिला के तौर से दिखाया जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि बॉलीवुड फिल्म निर्माता निर्देशक एवं कलाकारों ने ऐसा जानबूझकर किया है। ऐसा कर के वो सनातन धर्म का अपमान कर रहे हैं। ये बेहद निंदनीय है।
आदिपुरुष के पोस्टर ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। इसकी वजह से भविष्य में निश्चित तौर से भारत के विभिन्न राज्यों में लॉ एंड ऑर्डर को खतरा हो सकता है। और अब जब यह फिल्म रिलीज हो चुकी है, तमाम आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। यानी गलत मंशा से भूतकाल काे वर्तमान में दर्शाने की इस फिल्म के निर्माता, निर्देशकों ने इच्छा ने फिल्म का और उनका भविष्य संकट में डाल दिया है। अब तक के इस फिल्म के हाल को देखकर को बस दो ही शब्द मुंह से निकलते हैं... हे राम!







सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

पहले मशहूर शायर शहरयार की यह ग़ज़ल पढ़िए... सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है दिल है तो धड़कने...