अमूल विज्ञापनों के हेड दा कुन्हा कहते हैं, कार्टून खतरे में है...
अमूल गर्ल को रचने, उसे पहचान देने और देश के हर घर तक पहुंचाने वाले सिल्वेस्टर दा कुन्हा अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार देर रात उनका निधन हो गया। आइए जानते हैं सिल्वेस्टर दा कुन्हा और अमूल के रिश्ते की कहानी।
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यह बात सन 1966 की है। अमूल (Amul) ने ‘अमूल बटर’ के लिए एक ऐड कैंपेन डिज़ाइन करने का फ़ैसला किया। कंपनी ने एक विज्ञापन एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर सिल्वेस्टर दा कुन्हा (Sylvester da Cunha) से संपर्क किया। सिल्वेस्टर इस ऐड कैंपेन के लिए तैयार हो गए। पर समस्या ये थी कि विज्ञापन कैसा होगा और इसमें किसे कास्ट किया जाए, यानी किसे रोल दिया जाए। आख़िरकार यह तय हुआ कि विज्ञापन बच्चों से सम्बंधित होगा ताकि हिंदुस्तान के घर-घर में अमूल की जगह बनाई जा सके।
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डॉ कुरियन के अमूल गर्ल के सुझाव और टैगलाइन के फाइनल होने से सिल्वेस्टर दा कुन्हा को ऐड कैंपेन का सब्जेक्ट मिल चुका था। इसके बाद वे विज्ञापन बनाने की तैयारी में जुटे। उन्होंने विज्ञापन के लिए देशभर से बच्चों की तस्वीरें मंगवाई। इस दौरान उन्हें 700 से अधिक तस्वीरें मिलीं। लेकिन इनमें से एक भी बच्चे की तस्वीर ऐड के लिए सेलेक्ट नहीं हो पाई। इससे हैरान, परेशान सिल्वेस्टर दा कुन्हा को अचानक याद आया कि केरल में उनके दोस्त चंद्रन थरूर की 2 ख़ूबसूरत बेटियां और 1 बेटा है। सिल्वेस्टर ने चंद्रन को फ़ोन कर कहा कि वो उनकी बड़ी बेटी शोभा को अमूल (Amul) के विज्ञापन में लेना चाहते हैं। चंद्रन पहले तो हैरान रह गए फिर उन्होंने इसके लिए हामी भर दी।
सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने चंद्रन थरूर से कहा कि वो जल्द से जल्द शोभा की कुछ तस्वीरें भेज दें। और इस तरह सिल्वेस्टर ने ऐड कैंपेन के लिए 712 बच्चों की तस्वीरों में से शोभा को चुना और शोभा अमूल के इस ऐड कैंपेन का चेहरा बन गईं। शोभा यानी शोभा थरूर। चंद्रन थरूर की सबसे बड़ी बेटी शोभा, दूसरी बेटी का नाम स्मिता, जबकि बेटे का नाम शशि थरूर है। जी हां, कांग्रेस सांसद और देश के लोकप्रिय नेता शशि थरूर (Shashi Tharoor)।
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सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने जल्द ही रोजमर्रा के मुद्दों से संबंधित विज्ञापनों के साथ होर्डिंग्स की एक सीरीज के रूप में ऐड कैंपेन तैयार किया। क्योंकि तब टीवी या डिजिटल का जमाना तो था नहीं। होर्डिंग ही विज्ञापन का मुख्य साधन थे। उस समय ये ऐड कैंपेन भारत में इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाले ऐड कैंपेन के तौर पर ‘गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में नाम दर्ज़ करवाया। इस तरह से शोभा ‘अमूल गर्ल’ का चेहरा बन गईं और ‘Utterly Butterly Delicious’ ऐड कैंपेन के ज़रिए करोड़ों भारतीयों के दिल जीते। यही नहीं, ‘थरूर फ़ैमिली’ भी केरल में मशहूर बन गई।
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अमूल (Amul) का थरूर परिवार से जुड़ाव यहीं ख़त्म नहीं हुआ। कंपनी ने जब रंगीन विज्ञापनों की सीरीज़ जारी की तो इनके लिए अमूल ने चंद्रन थरूर की छोटी बेटी स्मिता को चुना। तब स्मिता ही पहली रंगीन अमूल बेबी थीं। देशभर में ‘अमूल गर्ल’ के तौर पर मशहूर होने के बाद सन 1977 में शोभा थरूर ‘मिस कोलकाता’ बनीं, जबकि स्मिता थरूर ‘मिस इंडिया’ की उपविजेता रहीं।
केवल शोभा और स्मिता ही नहीं, शशि थरूर को भी अमूल के साथ स्पेस शेयर करने का मौका मिल चुका है. शशि थरूर ने जब भारतीय राजनीति में कदम रखा था. इसके कुछ साल बाद वो एक बार अमूल कार्टून पर नज़र आए थे. इस पर शशि थरूर ने चुटकी लेते हुए कहा था, ‘आज अगर मेरे पिता ज़िंदा होते तो अपने बेटे को मुंबई के मरीन ड्राइव में लगे ‘अमूल के होर्डिंग्स’ पर देखकर बेहद ख़ुश होते’।
अमूल गर्ल का स्केच कला निर्देशक यूस्टेस फर्नांडीस द्वारा बनाया गया था। उनके पहले विज्ञापन में उत्पाद को "अटरली बटरली डिलेशियस" बताया गया था, जो सिल्वेस्टर की पत्नी, निशा दा कुन्हा बनाया था अमूल मोपेट के निर्माता और प्रतिष्ठित अमूल विज्ञापन बनाने वाले रेडियस एडवरटाइजिंग के बोर्ड के निदेशक यूस्टेस फर्नांडीस का 2010 निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे।
1966 में शुरू हुए अमूल बटर अभियान की बागडोर सिल्वेस्टर के बेटे राहुल दा कुन्हा ने 19 साल पहले संभाली। अब दा कुन्हा कम्युनिकेशंस के एमडी और क्रिएटिव हेड हैं। वे कॉपी राइटर मनीष झावेरी और डिजाइनर-कार्टूनिस्ट जयंत राणे के साथ अपने कोलाबा कार्यालय से काम करते हैं। यह तिकड़ी, जिसे हम ब्रांड अमूल के संरक्षक से कम नहीं कहेंगे, लगभग दो दशकों से एक साथ हैं।
अमूल की कीमत लगभग 1,2000 करोड़ रुपये है जबकि बटर अभियान के लिए विज्ञापन खर्च 30-40 करोड़ रुपये है। और इन विज्ञापनों के मूल में सिर्फ यही तीन व्यक्ति हैं!
निश्चित रूप से दा कुन्हा जूनियर के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। वे कहते हैं “अभी हम जिस समय में रह रहे हैं वह विवादों, अपराधों और घोटालों से भरा है। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि इसके अलावा, कार्टून 'खतरे में' हैं और अब हम कार्टून का प्रचार करने वाले एकमात्र ब्रांड हो सकते हैं,''।
इससे पहले दा कुन्हा ने कॉन्ट्रैक्ट एडवरटाइजिंग और लिंटास के साथ काम किया। लगभग दो दशक बीत जाने के बाद, उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अमूल उनका अधिकांश समय लेता है। हालांकि वह कभी-कभार थिएटर में भी हाथ आजमाते हैं। “मेरे लिए अपना कान ज़मीन पर रखना बहुत ज़रूरी है। एक देश के रूप में हम बहुत बेचैन हो गये हैं।
साथ ही, वह हमें अपने दर्शकों की प्राथमिकताओं में बदलाव के बारे में भी बताते हैं। “पहले, राष्ट्रीय मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण थे लेकिन अब, लोकल मुद्दे ज्यादा अहम हैं। मुंबई में एक आदमी को रेलवे बजट से ज्यादा शहर भर की खराब सड़कों की चिंता है। ऐसे में अब विज्ञापन अब राज्यवार सामने आते हैं,'' दा कुन्हा के मुताबिक अकेले मई में वे 18 विज्ञापन लेकर आए।
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| Sylvester da Cunha |
कहानी अमूल की
बात शुरु होती है 1948 से। यानी वह साल, जब गुजरात के मशहूर बिज़नेसमैन त्रिभुवनदास पटेल ने अमूल की नींव रखी थी। अमूल यानी ‘आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड’ एक भारतीय कॉपरेटिव डेयरी है जो गुजरात के आणंद में मौजूद है। यह गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन लिमिटेड (GCMMF) की ओर से मैनेज किया जाने वालीा एक ब्रांड है। सन 1970 में ‘श्वेत क्रांति’ के ठीक 3 साल बाद वर्गीज कुरियन अमूल से जुड़े।. डॉ. कुरियन ने सन 1973 से 2006 तक GCMMF के संस्थापक-अध्यक्ष के तौर पर अमूल को फ़र्श से अर्श तक पहुंचा दिया।और आज, अमूल भारत का सबसे बड़ा खाद्य ब्रांड बन चुका है। यही नहीं, अमूल ने विदेशी बाज़ार में भी क़दम रखा है। अमूल के प्रोडक्ट 20 से अधिक देशों में बिक रहे हैं।आइए अब अमूल गर्ल के बारे में जानते हैं
यह बात सन 1966 की है। अमूल (Amul) ने ‘अमूल बटर’ के लिए एक ऐड कैंपेन डिज़ाइन करने का फ़ैसला किया। कंपनी ने एक विज्ञापन एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर सिल्वेस्टर दा कुन्हा (Sylvester da Cunha) से संपर्क किया। सिल्वेस्टर इस ऐड कैंपेन के लिए तैयार हो गए। पर समस्या ये थी कि विज्ञापन कैसा होगा और इसमें किसे कास्ट किया जाए, यानी किसे रोल दिया जाए। आख़िरकार यह तय हुआ कि विज्ञापन बच्चों से सम्बंधित होगा ताकि हिंदुस्तान के घर-घर में अमूल की जगह बनाई जा सके।
अमूल का लोगो और इसके पापुलर टैगलाइन
अमूल के प्रोडक्ट्स ही नहीं इसक Logo भी भारत में काफ़ी मशहूर है। इसमें पोल्का डॉटेड फ़्रॉक पहने और नीले बालों की पोनी वाली एक लड़की नजर आती है। इसे हम सब ‘अमूल गर्ल’ के नाम से जानते हैं। उस समय ‘अमूल गर्ल’ को ‘अमूल’ के प्रतिद्वंद्वी ब्रांड ‘पोलसन’ की ‘बटर-गर्ल’ के काम्पिटीटर यानी प्रतिद्वंद्वी के रूप में बनाया गया था। और इसके पीछे ‘श्वेत क्रांति’ के जनक और ‘गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फ़ेडरेशन लिमिटेड’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. वर्गीज कुरियन का दिमाग था। दरअसल, जब अमूल ऐड कैंपेन के हेड सिल्वेस्टर दा कुन्हा को अमूल के लिए Logo समझ नहीं आ रहा था तभी डॉ. कुरियन ने उन्हें Amul Girl का सुझाव दिया था। इसी दौरान अमूल की टैगलाइन ‘Amul The Taste of India’ भी फ़ाइनल की गई थी।712 बच्चियों में से चुनी गयी थी अमूल गर्ल ‘शोभा’
डॉ कुरियन के अमूल गर्ल के सुझाव और टैगलाइन के फाइनल होने से सिल्वेस्टर दा कुन्हा को ऐड कैंपेन का सब्जेक्ट मिल चुका था। इसके बाद वे विज्ञापन बनाने की तैयारी में जुटे। उन्होंने विज्ञापन के लिए देशभर से बच्चों की तस्वीरें मंगवाई। इस दौरान उन्हें 700 से अधिक तस्वीरें मिलीं। लेकिन इनमें से एक भी बच्चे की तस्वीर ऐड के लिए सेलेक्ट नहीं हो पाई। इससे हैरान, परेशान सिल्वेस्टर दा कुन्हा को अचानक याद आया कि केरल में उनके दोस्त चंद्रन थरूर की 2 ख़ूबसूरत बेटियां और 1 बेटा है। सिल्वेस्टर ने चंद्रन को फ़ोन कर कहा कि वो उनकी बड़ी बेटी शोभा को अमूल (Amul) के विज्ञापन में लेना चाहते हैं। चंद्रन पहले तो हैरान रह गए फिर उन्होंने इसके लिए हामी भर दी।
आखिर कौन है अमूल गर्ल
सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने चंद्रन थरूर से कहा कि वो जल्द से जल्द शोभा की कुछ तस्वीरें भेज दें। और इस तरह सिल्वेस्टर ने ऐड कैंपेन के लिए 712 बच्चों की तस्वीरों में से शोभा को चुना और शोभा अमूल के इस ऐड कैंपेन का चेहरा बन गईं। शोभा यानी शोभा थरूर। चंद्रन थरूर की सबसे बड़ी बेटी शोभा, दूसरी बेटी का नाम स्मिता, जबकि बेटे का नाम शशि थरूर है। जी हां, कांग्रेस सांसद और देश के लोकप्रिय नेता शशि थरूर (Shashi Tharoor)।
इस तरह शोभा बन गईं ‘अमूल गर्ल’
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| शोभा थरूर अपनी मां के साथ |
सिल्वेस्टर दा कुन्हा ने जल्द ही रोजमर्रा के मुद्दों से संबंधित विज्ञापनों के साथ होर्डिंग्स की एक सीरीज के रूप में ऐड कैंपेन तैयार किया। क्योंकि तब टीवी या डिजिटल का जमाना तो था नहीं। होर्डिंग ही विज्ञापन का मुख्य साधन थे। उस समय ये ऐड कैंपेन भारत में इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाले ऐड कैंपेन के तौर पर ‘गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में नाम दर्ज़ करवाया। इस तरह से शोभा ‘अमूल गर्ल’ का चेहरा बन गईं और ‘Utterly Butterly Delicious’ ऐड कैंपेन के ज़रिए करोड़ों भारतीयों के दिल जीते। यही नहीं, ‘थरूर फ़ैमिली’ भी केरल में मशहूर बन गई।
शोभा ही नहीं, शशि और स्मिता थरूर भी अमूल के साथ जुड़े
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| स्मिता थरूर का पहला विज्ञापन |
अमूल (Amul) का थरूर परिवार से जुड़ाव यहीं ख़त्म नहीं हुआ। कंपनी ने जब रंगीन विज्ञापनों की सीरीज़ जारी की तो इनके लिए अमूल ने चंद्रन थरूर की छोटी बेटी स्मिता को चुना। तब स्मिता ही पहली रंगीन अमूल बेबी थीं। देशभर में ‘अमूल गर्ल’ के तौर पर मशहूर होने के बाद सन 1977 में शोभा थरूर ‘मिस कोलकाता’ बनीं, जबकि स्मिता थरूर ‘मिस इंडिया’ की उपविजेता रहीं।
| शशि थरूर भी विज्ञापन में नजर आए |
केवल शोभा और स्मिता ही नहीं, शशि थरूर को भी अमूल के साथ स्पेस शेयर करने का मौका मिल चुका है. शशि थरूर ने जब भारतीय राजनीति में कदम रखा था. इसके कुछ साल बाद वो एक बार अमूल कार्टून पर नज़र आए थे. इस पर शशि थरूर ने चुटकी लेते हुए कहा था, ‘आज अगर मेरे पिता ज़िंदा होते तो अपने बेटे को मुंबई के मरीन ड्राइव में लगे ‘अमूल के होर्डिंग्स’ पर देखकर बेहद ख़ुश होते’।
यूस्टेस फर्नांडीस ने बनाया था अमूल गर्ल का स्केच
राहुल दा कुन्हा हैं अमूल विज्ञापन अभियान के प्रमुख, कहते हैं कार्टून अब राष्ट्रीय नहीं, लोकल मुद्दों पर
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| राहुल दा कुन्हा |
1966 में शुरू हुए अमूल बटर अभियान की बागडोर सिल्वेस्टर के बेटे राहुल दा कुन्हा ने 19 साल पहले संभाली। अब दा कुन्हा कम्युनिकेशंस के एमडी और क्रिएटिव हेड हैं। वे कॉपी राइटर मनीष झावेरी और डिजाइनर-कार्टूनिस्ट जयंत राणे के साथ अपने कोलाबा कार्यालय से काम करते हैं। यह तिकड़ी, जिसे हम ब्रांड अमूल के संरक्षक से कम नहीं कहेंगे, लगभग दो दशकों से एक साथ हैं।
अमूल की कीमत लगभग 1,2000 करोड़ रुपये है जबकि बटर अभियान के लिए विज्ञापन खर्च 30-40 करोड़ रुपये है। और इन विज्ञापनों के मूल में सिर्फ यही तीन व्यक्ति हैं!
निश्चित रूप से दा कुन्हा जूनियर के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है। वे कहते हैं “अभी हम जिस समय में रह रहे हैं वह विवादों, अपराधों और घोटालों से भरा है। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि इसके अलावा, कार्टून 'खतरे में' हैं और अब हम कार्टून का प्रचार करने वाले एकमात्र ब्रांड हो सकते हैं,''।
इससे पहले दा कुन्हा ने कॉन्ट्रैक्ट एडवरटाइजिंग और लिंटास के साथ काम किया। लगभग दो दशक बीत जाने के बाद, उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अमूल उनका अधिकांश समय लेता है। हालांकि वह कभी-कभार थिएटर में भी हाथ आजमाते हैं। “मेरे लिए अपना कान ज़मीन पर रखना बहुत ज़रूरी है। एक देश के रूप में हम बहुत बेचैन हो गये हैं।
पहले, विषय और चर्चाएँ कम से कम एक पखवाड़े तक चलती थीं और हम हर शुक्रवार को एक विज्ञापन लेकर आ सकते थे। (अमूल गर्ल 'फ्राइडे टू फ्राइडे' स्टार के रूप में प्रसिद्ध थी।) अब, यह शुक्रवार की बात है, सोमवार की बात है, बुधवार की बात है और शायद उससे भी अधिक!"।
साथ ही, वह हमें अपने दर्शकों की प्राथमिकताओं में बदलाव के बारे में भी बताते हैं। “पहले, राष्ट्रीय मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण थे लेकिन अब, लोकल मुद्दे ज्यादा अहम हैं। मुंबई में एक आदमी को रेलवे बजट से ज्यादा शहर भर की खराब सड़कों की चिंता है। ऐसे में अब विज्ञापन अब राज्यवार सामने आते हैं,'' दा कुन्हा के मुताबिक अकेले मई में वे 18 विज्ञापन लेकर आए।














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