यह सवाल नहीं चिंता है। देश की आजादी के अमृत काल में अगर गांधी, जेपी की विरासत पर बुलडोजर चलने की बात हो रही हो तो चिंतित होना स्वाभाविक है। और यह चिंता तब और भी बढ़ जाती है जब ऐसा पहली बार नहीं हो रहा होता। पहले ऐसा गुजरात के साबरमती आश्रम के साथ हुआ और अब बनारस में गंगा किनारे बने सर्व सेवा संघ के साथ हाेने के आसार हैं।
इस मामले को समझने के लिए एनसीईआरटी की कक्षा 10 की राजनीति शास्त्र की किताब के एक अध्याय सत्ता की साझेदारी एक सवाल का जवाब पढ़ना चाहिए, इसके मुताबिक सत्ता की साझेदारी के अभाव में शासन कुछ चुनिंदा लोगों की मुट्ठियों मे रह जाता है। इससे तानाशाही पनपती है और लोकतंत्र की हत्या हो जाती है। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि लोगों के हाथों में सत्ता सौंपना ही लोकतंत्र की मूल भावना है। इसलिए हम कह सकते हैं कि सत्ता की साझेदारी हर समाज में जरूरी है। इस अध्याय का मूल पेज आप भी पढ़, देख सकते हैं, इससे पहले कि यह कोर्स से बाहर हो जाए। अगर अब तक न हुआ हो तो।
अब इस जवाब को 1975 के आपातकाल के संदर्भ में देखिए। चुनिंदा लोगों की मुटि्ठयों में सत्ता रखने की ही एक कोशिश थी देश में आपातकाल लगाना। लेकिन इस तानाशाही की कोशिश को तब देश की जनता ने जबर्दस्त आंदोलन के जरिए उखाड़ फेंका था। जयप्रकाश का बिगुल बजा तो, जाग उठी तरुणाई है और हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा, जैसे नारों के साथ पूरा देश लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलित हो उठा था।
इसी संपूर्ण क्रांति की एक अहम धुरी के तौर पर उस वक्त बनारस में गंगा के किनारे राजघाट पर बना, बसा सर्व सेवा संघ बेहद सक्रिय था। 1948 में गांधी की प्रेरणा से बनाया गया यह संस्थान उस दौर में संपूर्ण क्रांति और सर्वोदय आंदोलन का प्रेरणा स्रोत ही नहीं, शिक्षण, प्रशिक्षण और आंदोलन से जुड़े साहित्य के प्रकाशन का भी अहम केंद्र था। सरकार की बंदिशों के बावजूद तब यहां से तरुणमन जैसी पत्रिकाएं छापी, बांटी जा रही थीं। इन्हीं तमाम कोशिशों का नतीजा था कि 1977 में तानाशाही की बेलगाम कोशिश पर अंकुश लगा दिया गया। और इंदिरा गांधी को इस्तीफा देकर दुबारा चुनाव कराना पड़ा।
आखिर इस कहानी की आज क्या प्रासंगिकता है। जरूर है और बहुत ध्यान देकर इसे जानने की भी जरूरत है। दरअसल आज 48 साल बाद यकायक देश की राजनीति उस मुकाम पर आ पहुंची है, जहां सर्व सेवा संघ को ही गांधी और सर्वोदयी विचारों को दफनाने की मुहिम का एक नया पड़ाव बनाया जा रहा है। अगर 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से राहत नहीं मिली या यूपी अथवा केंद्र सरकार में किसी का हृदय परिवर्तन नहीं हुआ तो आने वाले कुछ दिनों में गांधी विचारों की ही तरह सर्व सेवा संघ के तमाम भवन भी ध्वस्त कर दिए जाएंगे।
आप पूछेंगे कि इसका जेपी के आंदोलन से भला क्या लेना-देना। तो इसके लिए चाणक्य का एक सूत्र प्रासंगिक होगा। वे कहते हैं, “जैसे ही भय आपके करीब आए, उस पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दीजिये।” आखिर यह भय किस बात का है। कहीं यह भय तो नहीं कि अगर फिर से तानाशाही की कोशिश की गई तो 1975 की ही तरह एक बार फिर सर्व सेवा संघ देश में जनांदोलन की धुरी बन सकता है। ऐसे में इसे जड़ से खत्म करना ही बेहतर होगा। संभवत: ऐसे ही किसी खतरे को भांपकर सत्ता पक्ष और उससे जुड़े तमाम बौद्धिक, वैचारिक संगठनों ने सर्वाेदयी संगठनों में घुसपैठ कर उन्हें अंदर से खोखला करने की मुहिम काफी पहले ही शुरू कर दी थी। शायद यही वजह है कि जब सर्व सेवा संघ परिसर के तमाम भवनों पर उन्हें ढहाने का नोटिस लगाया गया तो बहुत हैरानी नहीं हुई। दरअसल सत्ता की सोच अब उन प्रतीकों को भी ढहा देने की है जो किसी भी तरह लोगों को सत्ता को चुनौती देने की सफल कोशिशों की याद दिलाते हैं।
तो क्या वास्तव में सर्व सेवा संघ को ढहा दिया जाएगा। बहुत से संक्षेप में इस मामल को समझते हैं। पहले यह जानें कि सर्व सेवा संघ कब और क्यों बना। 1947 में देश आजाद हुआ। तब महात्मा गांधी ने सोचा कि देश को बेहतर बनाने के लिए, सर्वोदयी समाज की स्थापना के लिए सभी अखिल भारत रचनात्मक संस्थाओं को एकजुट किया जाए और नया भारत गढ़ने के काम में जुटा जाए। 2 फरवरी 1948 को वर्धा में इसी उद्देश्य से बैठक बुलाई गई थी। गांधी जी को भी इसमें आना था। लेकिन इससे दो दिन पहले 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मार दी। लेकिन गांधी विचार जिंदा रहे। गांधीजी की आकांक्षा को पूरा करने के लिए उनके साथी आचार्य विनोबाजी, किशोरलालजी मश्रूवाला, डॉ. जे. सी. कुमारप्पा, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, श्रीकृष्णदासजी जाजू, आदि ने मिलकर ‘अखिल भारत सर्व सेवा संघ’ नाम से अप्रैल 1948 में इसे बनाया।
अब यह सारा विवाद इसलिए सामने आया कि 16 जनवरी 2023 को किसी मोइनुद्दीन की ओर से बनारस सदर के उप जिलाधिकारी की कोर्ट में एक अर्जी डाली गई। इसमें दावा किया गया कि सर्व सेवा संघ की पूरी संपत्ति उत्तर रेलवे की है। शिकायतकर्ता मोइनुद्दीन की इस अर्जी पर न कोई पता दर्ज है, न ही फोन नंबर। लेकिन इस शिकायत को तहसील प्रशासन ने गंभीरता से लिया कि तहसीलदार, एसडीएम से लेकर डीएम तक जांच में जुट गए। इसके बाद लखनऊ स्थित उत्तर रेलवे के सहायक मंडल अभियंता ने बनारस के उप जिलाधिकारी (सदर) के यहां एक केस दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि फर्जीवाड़े से सर्व सेवा संघ ने 12.89 एकड़ जमीन हड़पी है। यानी सर्व सेवा संघ ने 63 बरस पहले बनारस के राजघाट में जिस जमीन का बैनामा कराया था, उसे रेल अफसरों ने कूटरचित दस्तावेज करार दिया है।
| तत्कालीन राष्ट्रपति और सर्व सेवा संघ के बीच जमीन को लेकर हुआ समझौता |
कोर्ट केसों की लड़ाई के बीच 15 मई 2023 को पुलिस और प्रशासनिक अफसरों ने सर्व सेवा संघ परिसर में मौजूद गांधी विद्या संस्थान (गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडीज) के कमरों का ताला तोड़कर उसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के हवाले कर दिया। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मुखिया हैं, जो फिलहाल राष्ट्रीय सेवक संघ से जुड़े हैं।
इस बीच सर्व सेवा संघ की अपील को तहसीलदार से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक में खारिज किया जा चुका है। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है जहां 14 जुलाई को सुनवाई होगी।
इस मामले में सर्व सेवा संघ के कार्यक्रम समन्वयक रामधीरज कहते हैं, ''साक्ष्य के तौर पर हमारे पास रजिस्ट्री के तीन दस्तावेज मौजूद हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद की संस्तुति के बाद रेलवे ने पूरी कीमत लेकर 12.89 एकड़ जमीन बेची थी। सर्व सेवा संघ के पक्ष में बैनामा बाद में हुआ और जमीनों की कीमत पहले चुकाई गई। सबसे पहले 05 मई 1959 को चालान संख्या 171 के जरिये भारतीय स्टेट बैंक में 27 हजार 730 रुपये जमा हुए। 750 रुपये स्टांप शुल्क भी दिया गया। इसके बाद 27 अप्रैल 1961 में 3240 रुपये और 18 जनवरी 1968 को 4485 रुपये चालान संख्या क्रमशः03 और 31 के जरिये स्टेट बैंक में जमा हुए।
हालांकि यही रामधीरज यह भी कहते हैं कि गांधी और सर्वाेदयी विचारों पर बनी संस्था को खत्म करने के बदले सरकार कम से कम मुआवजा तो दे ही दे। देखिए वीडियो।
अगर सुप्रीम कोर्ट ने सर्व सेवा संघ परिसर को ढहाने पर अस्थायी रोक लगा भी दी तो इसे कब तक रोका जा सकेगा, यह कहना जरा मुश्किल ही है। ऐसे में अब गांधीवादियों, सर्वोदयी लोगों को सरकार को यह सुझाव जरूर देना चाहिए कि अगर वे क्रांति और गांधी विचारों के प्रतीक चिन्ह को ढहाना ही चाहते हैं कि वहां होने वाले नए निर्माण में कम से कम एक छोटा सा संग्रहालय जरूर बनाएं जिसमें लिखा हो, निर्माण 1948,विध्वंस 2023। इस संग्रहालय में गांधी विचार से जुड़े इस शीर्ष संगठन के हिस्से रहे नेताओं के फोटो, उनकी किताबें, उनके लेख आदि भी होने चाहिएं। इनमें महात्मा गांधी, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, आचार्य कृपलानी, आचार्य विनोबा भावे, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जयप्रकाश नारायण, उनकी पत्नी प्रभावती, जेसी कुमारप्पा, आचार्य राममूर्ति, अच्युत पटवर्धन, नारायण देसाई, विमला ठकार, निर्मला देशपांडे, कृष्णराज मेहता, शंकर राव देव जैसी हस्तियां जरूर शामिल की जाएं। विश्व विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर ई.एफ शुमाखर की किताब `स्माल इज ब्यूटीफुल’ (Small is Beautiful ) भी इसका हिस्सा होनी चाहिए, जो उन्होंने यहीं लिखी थी।

