बिना मोबाइल, बिना गूगल, बिना सोशल मीडिया के उसने अपने परिवार और गांव के लिए खुशियां ढूंढ ली हैं
छोड़िए राजनीति, धर्म और कारोबार की ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाली खबरें। आज की खास खबर प्रणव के नाम। ऐसी खबर जो कर्नाटक में भाजपा की हार, 2000 के नोट की बंदी या द केरला स्टोरी अथवा केजरीवाल और केंद्र के बीच जारी सत्ता-संघर्ष और सिर-फुटव्वल वाली भीषण गर्मी पैदा कर रही खबरों के बीच एक ठंडी, शीतल छांव देती है। छोड़िए दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू की सड़कों की आपाधापी और चलिए महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर पालघर के पास धावांगे पाडा गांव।
महानगर मुंबई से महज 128 किमी दूर पालघर जिले में शहरीकरण से अछूता पेड़ों के बीच बसे केलवे में है धावांगे पाडा गांव। इन दिनों गांव में बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या अचानक बढ़ गई है। ये पर्यटक गांव से महज दो किलोमीटर दूर समुद्र को देखने नहीं आ रहे, बल्कि हर पर्यटक का डेस्टिनेशन है गांव के खेतिहर मजदूर रमेश केलकर का घर। इस घर तक पहुंचने के लिए एक ज़िगज़ैग मिट्टी की सड़क 'नाग-वेल' (पान के पत्ते) के खेतों और नमक के ढेर से गुज़रती है। रमेश सब्जी के खेत में मजदूरी करते हैं। अब आप कहेंगे कि भला एक खेतिहर मजदूर के घर में ऐसा क्या है, जिसे देखने इतने लोग वहां पहुंच रहे हैं। दरअसल ये तमाम लोग रमेश के घर उसी चार संतानों में सबसे छोटे बेटे महज 14 साल के प्रणव केलकर से मिलने जा रहे हैं। जी हां, वही प्रणव जिसने बीते महज 20-25 दिनों में एक छोटा सा कुआं खोदने का बहुत बड़ा काम किया है।
आप कहेंगे कि यह क्या बात हुई भला। कुआं खोदना कौन सा बड़ा काम है। खासकर आज जब बड़ी-बड़ी मशीनों का जमाना है, अर्थ रिमूवर मशीनें कुछ ही मिनटों में सैकड़ों फुट के गड्ढे खोद सकती हैं तो एक कुआं खोदना बड़ी खबर क्यों बनती है। बनती है जनाब। क्योंकि विकास के ये सारे दावे महाराष्ट्र के इस 600 की आदिवासी आबादी तक पहुंचते-पहुंचते सूख जाते हैं, बिल्कुल इस गांव के लोगों के प्यासे, सूखे गलों की तरह। कुछ ऐसी ही हालत प्रणव की मां दर्शना की भी थी। समुद्र से करीब होने की वजह से इस क्षेत्र का ज्यादातर पानी खारा है। पानी का लेवल काफी नीचे जा चुका है और तमाम स्रोत सूख चुके हैं। ऐसे में गांव की दूसरी महिलाओं की तरह प्रणव की मां दर्शना को भी हर दिन पीने के पानी के लिए तमतमाती धूप में रोज सुबह-शाम एक से डेढ़ किमी का चक्कर लगाना पड़ता था।
आदर्श विद्या मंदिर में नौवीं के छात्र प्रणव से मां का यह कष्ट देखा न गया। स्कूल की किताबों में पढ़े गए आदर्श बेटे के पाठ और उसके संस्कारों को असल जीवन में उतारने की जिद ने उसके जुनून का रूप ले लिया। उसने अपने पिता से बात की। कहा, कि वह मां की मदद के लिए घर के पीछे एक छोटा सा कुआं खोदना चाहता है। पहले पिता चौंके, फिर झिझके, लेकिन बेटे के जोश और जज्बे को मना न करे।
बस, फिर क्या था। फावड़े, गैंती के साथ प्रणव काम पर लग गया। इमली और पीपल के पेड़ों से घिरे खेत के बीच में ढाई फीट व्यास का कुआं खोदने का काम अपने हाथों से शुरू किया। मां बताती हैं कि हर दिन केवल 15 मिनट के लंच ब्रेक को छोड़कर बेटा दिन भर खुदाई में ही लगा रहता था। मां का प्यार, पिता का प्रोत्साहन और बेटे की जिद। इन सबने कुंए की खुदाई के समय मिले पत्थरों की बाधाएं भी आसानी से पार कर दीं। 20 फीट की गहराई तक जाते-जाते कुंए की भी आंखें भर आईं और उसने ताजा, मीठे पानी से खुद को भरना शुरू कर दिया। पानी आते ही प्रणव, मां दर्शना और पिता रमेश केलकर की खुशियों के भी मानो झरने फूट पड़े। जो काम राज्य सरकार, जिले के अधिकारी, इंजीनियर और विकास के नाम पर बहने वाले लाखों, करोड़ों रुपए नहीं कर पाए, वह काम एक बेटे की जिद, जोश, जुनून और जज्बे ने कर दिखाया।
प्रणव ने अपने कुएं के अंदर जाने के लिए खुद ही एक सीढ़ी भी बनाई है, ताकि बीच-बीच में नीचे जाकर उसे साफ कर सके। जरूरत पड़ने पर और गहरा भी कर सके। यही नहीं, कुंए के बगल में एक बोर्ड भी लगा दिया गया है जिसमें प्रणव के जिद की जीत की कहानी दर्ज है।
इसी कहानी के किरदारों से मिलने और इस सफलता को महसूस करने महानगरों से लोग यहां पहुंच रहे हैं। इस उपलब्धि ने नौवीं कक्षा के आदिवासी छात्र प्रणव को सेलिब्रिटी बना दिया है। अब प्रणव की चिंता यह है कि मीडिया की चकाचौंध उसे कहीं रोज वाली लंबी सैर, पेड़ों पर चढ़ने और पक्षियों को देखने के उनके दैनिक रूटीन के आड़े न आ जाए। प्रणव के घर के पास के एक पेड़ से बंधी, एक लंबी रबर की नली अस्थायी झूले का काम करती है। प्रणव ने कहा "मुझे ऊंची उड़ान भरना पसंद है।"
बेहद शर्माला आदिवासी युवा प्रणव नहीं चाहता कि और लोग यहां आएं। वह अपने रोज के काम में ही खुश है। उसने बिना मोबाइल, बिना गूगल, बिना इंस्टाग्राम, बिना ट्विटर, बिना फेसबुक के अपने, अपने परिवार और अपने गांव के लिए खुशियां ढूंढ ली हैं। प्रणव ने मोटरसाइकिल की बैटरी के प्रयाेग से एक सोलर पैनल भी तैयार किया है, जिससे वह अपने घर में रात को रोशनी कर सकता है।
प्रणव की मां दर्शना ने मीडिया का जिक्र करते हुए कहा, "दूसरे दिन वह घर वापस चला गया और कैमरा क्रू के साथ मीडियाकर्मियों की एक टीम को आते देख रोने लगा।" जब प्रणव से पूछा गया कि उसे किस बात ने अकेले ही अपने आंगन में कुआं खोदने के लिए प्रेरित किया? इस पर प्रणव ने कहा, "मुझे अपनी मां को पास के नाले से पानी लाना पसंद नहीं था। वह हर सुबह खाना पकाने और घर के अन्य कामों से पहले घर से पानी की बाल्टी ले जाती थीं।"
प्रणव की सफलता की खबर सबसे पहले पूरे केलवे में बड़ी तेजी से फैली। ग्रामीणों ने उसके बनाए कुएं की ओर रुख किया, जबकि आस-पास की 'बस्तियों' के दोस्तों ने प्रणव के धवंगपाड़ा स्थित घर का दौरा किया प्रणव ने कहा, "मेरे स्कूल के शिक्षक भी कुएँ को देखने आए थे," उसके चेहरे पर एक मुस्कान चमक रही थी। पंचायत समिति के प्रमुख संदीप किनी ने कहा कि स्थानीय निकाय ने तुरंत प्रणव के आंगन में एक नल लगाया। किनी ने कहा, "समिति उन्हें कुछ और मदद देने के लिए उत्सुक है।" लाखों के वेतन लेने के बाद भी गांवों को पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं न मुहैया करा पाने वाले सरकारी अधिकारी अपनी शर्म मिटाने के लिए प्रणव को उसकी सफलता पर बधाई दे रहे हैं। जिला परिषद के अधिकारियों ने प्रणव को 11 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि दी है।
आभार: इस सकारात्मक खबर के लिए तमाम स्रोतों का





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